गुरुवार, 10 अगस्त 2017

एक मौन सामाजिक क्रांति का वाहक व्हाट्सएप


आज कीपेड फोन मानो अजायबघर की शान बन गई है इस फोन की बिक्री लगभग बंद हो चुकी है बिक्री यदि जोरो में है, तो बस स्मार्टफोन कम से कम कीमत में भी अधिक से अधिक कीमत में भी, स्मार्ट फोन ने लोगों की जिंदगी को बहुत हद तक प्रभावित किया है खासतौर पर व्हाट्सएप ने. यदि किसी के पास स्मार्टफोन है लेकिन इसमें व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के एप नहीं है तो यह माना जाता है कि बंदर के हाथ में मोतियों की माला है या यूं कहें कि हम जैसे बहुत सारे लोगों ने कीपैड मोबाइल के खराब होने पर स्मार्टफोन सिर्फ इसी लिए खरीदा की व्हाट्सएप चलाना है.
आज यदि कोई पूछे भारत में क्या चल रहा है तो एक ही जवाब बनता है व्हाट्सएप चल रहा है. क्या राष्ट्रवादी, क्या प्रगतिशील, क्या देशवादी, भले ही पानी पी पी के विदेशी वस्तुओं का, ऐप का, बहिष्कार करने के लिए नारा लगाएंगे. लेकिन व्हाट्सएप से 1 घंटे भी दूर नहीं रह सकते. ये है ही ऐसी बला प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी में यदि यह मुहब्बत और तल्खी का कारण बना है, तो पड़ोसी पड़ोसन के करीब आने का भी कारण बना है 
भारत में सरकारी विभाग तो WhatsApp को इसे  एसे उपयोग करती है मानो उन्होंने इसे पेटेंट करा रखा है या कहे खरीद लिया है. बहुत सारे आदेश, सस्पेंशन आदेश, नियुक्ति आदेश, कार्यवाहियों के आदेश इसी में पारित होता है. कर्मचारियों की निगरानी इसी से की जा रही है कुछ मातहत तो इसीलिए स्मार्टफोन बेचकर पुराना की फोटो कीपैड फोन ले लिए क्योंकि व्हाट्सएप के सरकारी दुरुपयोग से बहुत हद तक परेशान थे. ऐसा प्राइवेट कंपनियां भी कर रही है लेकिन वह इसे क्रिएटिविटी के तौर पर इस्तेमाल कर रही है ना कि सरकारी विभाग की तरह शिकंजा कसने के लिए.
चुकी आज व्हाट्सएप पर कथा निकल चुकी है तो यह बताना जरुरी है कि भरत में व्हाट्सएप के ग्रुप कुल जमा दो भागों में विभक्त है इन दो विभागों पर चर्चा करने से पहले यह जानना जरूरी है कि ग्रुप क्या है? और इसके कितने प्रकार हो सकते हैं?
दरअसल व्हाट्सएप ग्रुप एक खास विषय की ओर इशारा करता है जिस पर ग्रुप के सदस्य आपस में सूचना और विचारों का आदान प्रदान करते हैं. वर्तमान में व्हाट्सएप ग्रुप में 256 सदस्य हो सकते हैं.
आइए अब जाने की व्हाट्सएप एक ग्रुप कितने प्रकार के हो सकते हैं व्हाट्सएप ग्रुप कुल 13 विभागों में बांटा जा सकता है
(पहला) सामाजिक जातिगत वर्ग गत पारिवारिक ग्रुप
(दूसरा) धार्मिक ग्रुप
(तीसरा) अंधविश्वास विरोधी, प्रगतिशील, तर्कशील ग्रुप
(चौथा) साहित्यिक ग्रुप
(पांचवा) समाचार ग्रुप
(छठवां) कर्मचारियों-अधिकारियों का गैर विभागीय ग्रुप
(सातवां कर्मचारियों-अधिकारियों का विभागीय ग्रुप
(आठवां) कालोनियों, मोहल्लों के ग्रुप
(नवा) सोसाइटियों के ग्रुप, संस्थाओं के संघों के ग्रुप
(दसवां) चुटकुला हंसी मजाक अश्लील ग्रुप
(ग्यारवा) स्टूडेंट के शैक्षणिक ग्रुप
(बारवा) राजनैतिक ग्रुप
(तेरवा) व्यवसायिक ग्रुप
इन सब प्रकार के ग्रुप में अब व्यक्ति की जिंदगी सिमट कर रह गई है, लेकिन इसमें महत्वपूर्ण बात यह है, कि यह सभी ग्रुप दो अलग-अलग विचार धाराओं को लेकर चल रहे हैं, यानी विचारधारा के हिसाब से यदि ग्रुप क्रमांक 3 को छोड़ दें तो बाकी ग्रुप दो भागों में बांटे जा सकते हैं इन दोनों विचारधाराओं को हम और बी का नाम दे सकते हैं


ग्रुप ए

ग्रुप बी

1
 पति-पत्नी के रिश्ते, महिलाओं को नीचा दिखाने वाले मैसेज डाले जाते है. 

महिला पत्नी को नीचा दिखाने वाले मैसेज नहीं भेजे भेजे जाते हैं या भेजे जाने पर बुरा माना जाता है या ऐसे ग्रुप में पाबंदी होती है.
2
वंचित वर्ग को मजाक उड़ाया जाता है.

वंचित वर्ग या अल्पसंख्यक वर्ग या पीड़ित वर्ग की कद्र की जाती है उनके प्रति सद्भावना होती है.
3
हर प्रकार की समस्या का मुद्दा उठाया जाता, उस पर गहन चर्चा होती और उसका कारण अंत में आरक्षण को बताया जाता है.
वंचितों को दिए गए बराबरी के अधिकार एवं सुविधाओं का विनम्रता से समर्थन किया जाता है.

4
धार्मिक उन्माद, शत्रुता, जाति कटुता बढ़ाने वाले मैसेज भेजे जाते है.

धार्मिक उन्माद आपसी शत्रुता बढ़ाने वाले संदेश नहीं भेजे जाते हैं, बल्कि आपस में समाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले मैसेज को तरजीह दी जाती है.

5
छद्म देशभक्ति के नाम पर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने वाले संदेशों की भरमार होती हैं.

देशभक्ति के साथ-साथ अपनी गलतियों, भूलों चूकों का भी सावधानीपूर्वक पुनरवलोकन करते हैं.

6
किसी खास वर्ग को ऊंचा या किसी खास वर्ग को नीचा दिखा कर अक्सर जलील करने वाले संदेश भेजे जाते हैं. खासकर दलितों पिछडो अल्पसंख्यक  (मुस्लिमों सिखों जैनियों के विरोध में).

सभी वर्ग को समान आदर नजर से देखा जाता है.

7
ऐसे ग्रुप अपने आप को प्रगतिशील बताते हैं लेकिन इसमें ऐसे सदस्यों की भरमार होती है जो लिंग भेद, रंग भेद,  धर्म भेद, ऊंच-नीच, छुआछूत जैसी असमानता का संस्कृति के नाम पर छद्म विज्ञान के नाम पर समर्थन किया जाता है.

ऐसे ग्रुप के सदस्य लिंगभेद, रंगभेद, धर्म भेद,  ऊंच-नीच, छुआछूत, अंधविश्वास आदि असमानता की संस्कृति के नाम पर समर्थन नहीं करते हैं, बल्कि उनको मिटाने की बात करते हैं


यदि आप व्हाट्सएप का प्रयोग करते हैं तो आप आसानी से इन दोनों प्रकार के ग्रुप के वैचारिक अंतर को पहचान सकते हैं व्हाट्सएप में व्यक्ति एवं भारत के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया यह एक और किसी व्यक्ति की छद्म प्रगतिशीलता की पोल खोली है. तो दूसरी ओर कट्टरवाद का मुंहतोड़ जवाब भी दिया है. इसे भारत में मौन सामाजिक क्रांति की तरह देखा जाना चाहिए. आज जब किसी व्यक्ति के पास किताब-लेख पढ़ने का समय नहीं है, वही व्हाट्सएप ग्रुप किताब पढ़ने जैसा ज्ञान देता है, हालांकि भ्रम ज्ञान बांटने वालों की भी कमी नहीं है. यहां जिस प्रकार प्रिंटेड पत्र पत्रिकाओं किताबों में भ्रमित ज्ञान मिलता है उसी प्रकार व्हाट्सएप में भी भ्रमित ज्ञान मिल सकता है. लेकिन इंटरनेट के दौर में झूठा या भ्रमित ज्ञान ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता. बावजूद इसके व्हाट्सएप कि इस सोशल क्रांति को सकारात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए. 
दैनिक देशबंधु में प्रकाशित धन्यवाद   संजीव खुदशाह