शनिवार, 2 मार्च 2013

दहेज एवं उसका अर्थशास्त्र

दहेज एवं उसका अर्थशास्त्र



संजीव खुदशाह
आज दहेज शब्द समाज में एक दानव के रूप में प्रचारित है। कितनी ही शादियां दहेज के कारण होती हैं और कितनी ही शादियां दहेज के कारण भी टूटती भी हैं। जिनके घर दहेज के कारण बर्बाद हो रहे है उनके लिए दहेज एक दानव की तरह है। जिनके आबाद हो रहे है (दहेज लेने वाले के नजरिए से) उनके लिए दहेज रूतबा और लक्ष्मी का प्रतीक भी है वैसे तो दहेज विरोधी होना आज एक फैशन की बात हो गई है लेकिन शायद ही कोई होगा जो लक्ष्मी से प्यार न करता हो। बडे-बडे अादर्शवादी भी दहेज के नाम पर लार टपकाते देखे जाते हैं। ज्यादातर यही होता जिन्हें दहेज नहीं मिला वे दहेज विरोधी बन जाते। जिन्हें मिला वे चुप बैठ जाते हैं। खास कर जिनके घर लड़कियां ज्यादा हैं वे पक्के दहेज विरोधी हो जाते और लड़के के मामले में लड़कियों को देने का हवाला देकर खूब दहेज बटोरते। लेकिन समाज में दहेज को दानव के रूप में प्रचारित करना सभी को अच्छा लगता है। यह फैशन नया-नया सही किन्तु सर्वे स्वीकृत अवश्य है।
ज्यादातर यही माना जाता रहा है कि दहेज जैसी कुप्रवित्ति हमारे समाज की संस्कृति में नहीं रही है यह तो विदेशी सभ्यता की देन है। जैसा कि सभी सामाजिक बुराईयों के बारे में फांसिवादियों का हथियार रहा है। यही मान्यता समाज के ठेकेदार इस मामले में कहकर अपने दामन एवं संस्कृति को पाक साफ होने का मुहर लगा देते हैं। लेकिन एक पुत्री को वस्तु तथा साथ में दिए जाने वाले समान को उपहार समझना इसी समाज की बहुत पुरानी परम्परा है ऐसे प्रमाण मिलते है। मनुस्मृति तृतीय अध्याय श्लोक 21 में विभिन्न प्रकार के विवाह का उल्लेख किया गया है ये विवाह आठ प्रकार के हो सकते हैं।
जिनमें आदर्श विवाह ब्राम्ह विवाह है-
ब्राम्ह विवाह-विद्या और आचार युक्त वर को बुलाकर और उत्तम वस्त्रों और अलंकारों से कन्या तथा वर को भूषित कर वर को जो कन्यादान दिया जाता है, उसको ब्राम्ह विवाह कहते हैं।
यहां पर कन्या एक दान कि वस्तु (न कि एक मनुष्य) है। तथा इस दान के साथ उत्तम वस्त्र तथा अलंकार (आभूषण, उपहार आदि) भी दिया जाता है। यही अलंकार ही दहेज का पितामह है। जिन्होंने दहेज नामक शिशु को जन्म दिया। राजाओं के समय दहेज में हजारों नौकर-चाकर, दास-दासियां, हाथी, घोड़े दिया जाना सर्व विदित है। लेकिन संस्कृति के झण्डाबरदार यही कहते फिरते हैं कि दहेज तो मुसलमानों की देन है। हमारी संस्कृति में दहेज-वहेज नहीं चलता था। आइए देखें मुसलमानों में विवाह की क्या प्रक्रिया है।
निकाह-काजी के सामने दुल्हा, दुल्हन को दिए जाने वाले मुकरर मेहर की रकम अदा करेगा तथा दोनों पक्ष विवाह कुबूल करके निकाहनामे में अपने-अपने दस्तखत करेंगे।
यहां पर दुल्हा-दुल्हन को मेहर के रूप में कुछ धन देता है। लेकिन दहेज लेने का रिवाज यहां नहीं था यह रिवाज कब चालू हुआ अभी कहना कठिन है फिर भी मुसलमानों में दहेज समस्या उतनी विकराल नहीं है जितनी हिन्दु समाज में है। अत: यह समस्या मुसलमानों से आई कहना गलत है।

आइए देखें दहेज की समस्या को विभिन्न कोणों से-
0 दहेज एक नारीवादी समस्या नहीं है यह एक खालीस एवं शुद्ध सामाजिक समस्या है, क्योंकि यदि कोई परिवार दहेज समस्या से पीड़ित है तो अन्य प्रकरण में वो दहेज का शोषक बन जाता है। यदि अपनी लड़की के मुआमले में वो परिवार पीड़ित होता है तो लड़के के मामले में पूरा दहेज लोभी बन जाता है। अत: उसे नारीवादी से पुरुषवादी बनने में क्षणभर भी समय नहीं लगता है। इसलिए इस समस्या को नारीवादी दृष्टिकोण से देखना गलत होगा।
0 दहेज की समस्या सिर्फ दहेज मांगने में नहीं है। उससे कहीं ज्यादा बढ़कर दहेज देने के लिए होड़ लगने में है। दरअसल भारतीय समाज में वधु पक्ष एक आदर्श वर जो उसके लेवल से कहीं अधिक सर्व सुविधायुक्त हो की तलाश करता है। यही आदर्श वर कि तलाश उसे दहेज के लिए प्रेरित करती है। आदर्श वर की निम् खासियत होनी चाहिए। (मध्य श्रेणी परिवारों के लिए):-
(1) अपनी ही जाति का हो (2) वांक्षित गोत्र का हो (3) उच्च शिक्षित हो (4) शासकीय नौकरी या स्थापित व्यवसाय में हो (5) परिवार समृद्ध हो (6) परिवार प्रतिष्ठित हो।
 उसके साथ-साथ यदि वर गोरा और स्मार्ट हो तो सोने पर सुहागा हो जाता है। ऐसे आदर्श वर की तलाश में वधु पक्ष अपनी शक्ति खर्च करता रहता है जैसा कि एक साधारण बुद्धिवाला व्यक्ति भी कह सकता है कि ऐसे 7 (सात) गुणों वाला वर तो बिरलों को ही मिल सकता है। क्योंकि समाज में बहुत ही कम परिवार में ही ऐसे वर मिल सकते हैं। जिनकी मांग पूरे समाज को है। आइए अब देखें एक आदर्श वधु कि तलाश में क्या-क्या गुण ध्यान दिए जाते हैं।
(1) अपनी जाति की हो। (2) वांछित गोत्र की हो (3) खूबसूरत हो (4) परिवार समृद्ध एवं विनम्र हो (5) पढ़ी-लिखी हो।


वर पक्ष बिन्दु क्रमांक (1) एवं (2) पर कोई समझौता नहीं करता है लेकिन 3,4,5 पर अपना सामंजस्य बिठाने की चेष्टा करता है। जैसे ज्यादा खूबसूरत हो तो गरीब परिवार भी चलेगा यानी कम दहेज भी चलेगा आदि। लेकिन वधु पक्ष बिन्दु क्रमांक (वर पक्ष का) 1,2,3,4,5 पांचों गुणों पर ध्यान केन्द्रित करता है। भले वर देखने में कितना ही कुरूप हो किन्तु यदि बिन्दु क्रमांक 1,2,3,4,5 की शर्त पूरी करता है तो वधु पक्ष हर कीमत में ऐसे वरन् से संबंध जोड़ना चाहते हैं। बस यहीं से चालू होता है वर पक्ष को दहेज का ऑफर देकर विवाह की परिणति तक लाने का। ऐसी स्थिति में इन गुणों से भरपूर वर पक्ष वाले अपनी मांग को बढ़ता हुआ देखकर अपना मूल्य बढ़ाते जाते हैं। इसमें वधु पक्ष के बिन्दु क्रमांक (3) तथा (4) का ध्यान रखकर मूल्य तय किए जाते हैं। यदि कन्या काली या भद्दी है तो दहेज मूल्य और बढ़ जाता और कन्या पक्ष वाले भी ज्यादा देने का ऑफर देते हैं। व्यक्ति के ऐसे व्यवहार का असर पूरे समाज पर पड़ता और गरीब, मध्यम गरीब परिवार भी उसी आदर्श स्थिति को प्राप्त करने की कोशिश में लगा रहता। इसलिए दहेज आज एक साधारण व्यवहार के रूप में स्थित है। बिना दहेज के शादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस मुआमले में सिर्फ प्रेम विवाह को एक अपवाद कहा जा सकता है। नहीं तो प्रेम विवाह को भी अरेंज विवाह का जामा पहना कर दहेज की कसौटी पर कसे जाने की परंपरा चालू हो चुकी है। कई बार ऐसा देखा जाता की अमुक ने बिना दहेज की शादी की लेकिन उसके कारण की पड़ताल की जाती तो पता चलता कि लड़की बेहद खूबसूरत तथा गुणवान थी इसलिए लड़के वालों ने बिना दहेज शादी की।
यानी दहेज किसी न किसी रूप में लिया जा रहा है। चाहे वो कन्या की खूबसूरती ही क्यों न हो। आज कितनी ही सामान्य नैन नक्श की युवतियां दहेज विरोधी बनकर आजीवन कुंवारी बैठी रहती है। कारण स्पष्ट है वे समाज के मांग एवं पूर्ति में सामंजस्य नहीं बिठा पाई। वहीं खूबसूरत लड़कियों के लिए कोई समस्या नहीं कम दहेज में भी ठीक-ठाक लड़के से विवाह कर घर बसा सकती है। यहां भी मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्र की संतुष्टि हो रही है। वहीं कई ऐसे प्राईवेट व्यवसाय वाले साधनहीन युवक है जो साधारण सूरत तथा बिना दहेज के युवती से विवाह करके घर बसा लेते हैं। यहां भी कारण स्पष्ट है कि अविवाहित रहने से अच्छा है विवाहित रहना। यानी दहेज के अर्थशास्त्र की संतुष्टि यहां भी हो रही है।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम आदर्श वर के मुआमले में अपने आपको थोड़ा शिथिल करें तो बिना दहेज के शादी कर सकते हैं। लेकिन दहेज के नाम पर हाय-तौबा मचाने वाला ये समाज इतनी थोड़ी सी बात नहीं समझ पाता। ज्यादातर यही होता कि आदर्श वर को पाने के बाद वधु पक्ष रिश्ता फिट करने की जुगत में भिड़ जाता, चाहे उसे साम, दाम, दण्ड, भेद कोई भी नीति क्यों न अपनानी पड़ जाए। इस कोशिश में वर पक्ष को ऊंचे-ऊंचे वायदे किए जाते ऑफर दिए जाते। विवाह पश्चात वर पक्ष इन आफरों को फलीभूत होते देखना चाहता। यहीं से शुरू होती है महिलाओं के प्रताड़ना की शुरूआत। जिसके लिए मैदान उसी के अपने परिवार ने तैयार की थी। लेकिन ऐसे मुआमले में वधु पक्ष वाला पीड़ित एवं निर्दोष बनने का ढोंग (कुछ मुआमले में सच भी) करने लगता है और अपनी गलतियों को भूल जाता है। आखिर दहेज का लालच तो आपने ही दिया, मांगे तो आपने ही पूरी कीं तो परिणाम भी आपको ही भुगतने पड़ेंगे। इसी कारण कानून में भी दहेज लेना एवं देना दोनों जुर्म है। काश, दहेज देने वालों को भी सजा होती तो आज यह समस्या ही न होती। रोज शादियों में बैण्ड-बाजों के साथ ऐसे जुर्म होते देखे जा सकते हैं खुलेआम। आखिर क्यों नहीं दहेज देने वालों पर जुर्म दर्ज होता जब शादी हो रही होती। आखिर क्यों नहीं उस पक्ष पर मुकदमा दर्ज होता जब वह स्वीकार करता की उसने दहेज दिया है।
वास्तव में कानून के इम्पलीमेंट के तरीके से तो लगता है कि कोई इस समस्या को जड़ से सुलझाना नहीं चाहते चाहे वो महिलावादी हो या सुधारवादी। सभी अपनी-अपनी रोटियां सेकना चाहते हैं।