मंगलवार, 30 जून 2015

सकारात्मकता, समतावादी आंदोलन का आकर्षण है

सकारात्मकता, समतावादी आंदोलन का आकर्षण है
संजीव खुदशाह
अगर कोई मुझसे कहता की मैं एक कट्टर बौध्‍द हूँ, या कट्टर आंबेडकरवादी हूँ, तो मैं उसे कट्टर तालीबानी के बराबर ही समझता हूँ। जिनका काम आपसी द्वेश फैलाना है। क्योकि बुध्द और आंबेडकर के विचार कट्टरता खत्म करते है नकी बढ़ाते है। दरअसल, आज तक जितने भी समता आंदोलन हुऐ है। उनमें कट्टरता के बजाय विद्रोह का समावेश रहा है। वे बिना सभी के सहयोग के पूर्णं नही हुये। चाहे शोषक वर्ग ही क्यो न हो। असल में शोषक वर्ग में जन्म लेने का अर्थ यह नही है कि वह केवल और केवल शोषक ही हो। ठीक उसी तरह शोषित वर्ग में जन्म लेने का अर्थ यह नही होता कि वह समता का समर्थक हो। यदि हम वर्ग के भेद को मिटाना चाहते है तो वर्ग भेद को मिटाने का पहला कदम यही होगा कि हम इस आंदोलनकर्ताओं में ही वर्ग भेद को पूरी तरह से मिटा दे। उच्च वर्ग के समतावादी लोगो को अपने साथ लेकर। उसी प्रकार यदि हम जातिभेद को मिटाना चाहते है तो हमें वास्तव में बिना किसी जाति भेद के इस आंदोलन में सभी को साथ ले जो आपके साथ आना चाहते है या मदद कर रहे हैं।
बाबा साहेब डाँ आंबेडकर को मानने वाले ज्यादातर लोग सिर्फ सवर्णो को कोसने, या देवी देवता को नीचा दिखाने को ही आंबेडकरवादी होने का सबसे बडा प्रमाण पत्र मानते है। यदि ऐसा आंबेडकरवादी शब्द समता आंदोलन का पर्याय माना जाता है और कबीर, फुले, बुध्द को अपना मार्गदर्शक मानता है। तो मेरे ख्याल में यह संसार का सबसे बडा भ्रम है। क्योंकि कबीर फुले और बुध्द की जीवनी को देखे तो ज्ञात होता है की उन्होने विचार को गलत या सही ठहराया, न कि किसी व्यक्ति या जाति को। खुद डाँ आंबेडकर के करीबी और मददगार ब्राम्हण ही थे। उनके गुरू जिनसे उन्होने अपना सरनेम आंबेडकर प्राप्त किया वे ब्राम्हण ही थे। उनकी दूसरी पत्नी भी ब्राम्हण ही थी। वे सब जिन्होने आंबेडकर को संविधान लिखने के लिए मौका दिया। वे भी ब्राम्हण और सवर्ण ही थे। मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहर लाल नेहरू सभी बैरिस्टर पास थे उनमें ऐसी कोई कमजोरी नही थी कि वे संविधान नही लिख सकते न ही ऐसी कोई मजबूरी थी कि डाँ अंबेडकर को ही संविधान बनाने की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया जाय। लेकिन उन्होने ऐसा किया इसका एक कारण था वे डाँ आम्बेडकर की समतावादी नीति के कायल थे। वे इस स्वतंत्र भारत को ये संदेश देना चाहते थे अब भारत विकास की ओर आगे बढे़गा क्योंकि अब यहां समानता है।
आंबेडकरी आंदोलन के लोग अपनी गोष्टियों में उन बातो की चर्चा ज्यादा करते जिन्हे उन्हे नकारना है। उनकी चर्चा कम होती जिन्हे उन्हे स्वीकारना है। इसका असर ये होता है कि आम आदमी इनसे दूर होता जाता है। मैं यह बात उन सभी समतावादी आंदोलन के बारे मे कह रहा हूँ जो दलित, ओबीसी या आदिवासी वर्ग से ताल्लुख रखते है। आंबेडकरी आंदोलन क्यों अच्छा है ये बताने का काम बहुत कम लोग कर रहे हैं। हिन्दू धर्म में बुराई है ये बार-बार बताने की कोशिश होती है। अक्सर एक आम आदमी हिन्दू धर्म की बुराई सुनकर घबरा जाता है, और विकल्प खोजता है। सही विकल्प नही मिलने के कारण वह अपने शोषण को ही अपनी नियती मानने लगता है। इस कारण ये आंदोलन आज नकारत्मक आंदोलन का पर्याय बन गया है। समतावादी आंदोलन सिर्फ समाज की सच्चाई को आम आदमी तक पहुंचाने का कार्य करेगी तो वह आंदोलन नही एक डाकिये का काम करती है। और डाकिये कभी आंदोलन नही लाते। बदलाव लाने के लिए उसके पूरे चरण में काम करना होगा। नकारात्मक से ज्यादा सकारात्मक मुद्दो पर बात करनी होगी। अगर कोई चीज गलत है, तो ये बताना होगा सही क्या है और वो सही क्यो है? ये भी बताना होगा।
आज बौध्द धर्म सीमित होता जा रहा है। उसका कारण है। बौध्द धर्म के लिए धर्मांतरित तो काफी लोग हुऐ। उन्हे 22 प्रतिज्ञायें भी दिलाई गई। इसमें से जोर इस बात का ज्यादा दिया गया की क्या नही करना है। क्या करना है उस प्रतिज्ञा को बार बार नही उछाला गया। बौध्द धर्म इसलिए महान है क्योंकि उसकी शिक्षायें सम्यक है। वे संतुलन की शिक्षा देते है। बौध्द धम्म जीवन जीने का एक महान तरीका सिखाता है आश्चर्य की बात है कि यदि बौध्द धर्म के सिर्फ पंच शील का पालन करे तो व्यक्ति का जीवन उन्नति की ओर अग्रसर हो जायेगा। लेकिन यहां जांच इस बात की होती है की व्यक्ति दिवाली में दिये जलाता है या नही, जांच इस बात की नही होती की वह पंचशील का पालन करता है या नही। इतिहास बताता है कि पहले पूरा भारत बौध्दमय था। और बौध्दों के सारे त्यौहारों को हिन्दू त्योहारों में तबदील कर दिया गया। यही कारण है कि डाँ आम्बेडकर ने धर्म चक्र प्रर्वतन दिवस का दिन दशहरे के दिन को चुना और आज बौध्द इसे अशोक विजय दशमी के नाम से पुकारते है। उसी प्रकार कुछ इतिहासकार समाज सेवक ये मानते है कि दलित और पिछडा वर्गो के परिवार में घर के अंदर पूजी जाने वाली देवी महामाया कोई और नही बल्कि बुध्द की माता ही है। ऐसे सैकडो सकारात्मक तथ्य हमारे पास है जिन्हे हम लोगो तक पहुचा सकते है। मैं यहां पर जानकारी देना आवश्यक समझता हूं कि बौद्ध धर्म के पतन के समय हीनयांन-महायान से कुछ पंथ भी तैयार हुए। ये पंथ बौद्ध भिक्षुओं से ही टूटकर बने थे। इन्ही में एक पंथ नाथ सम्प्रदाय था, जिसमें बौध्द धर्म के अवशेष नाम-मात्र के थे। नाथ संप्रदाय आज  हिन्दू धर्म के पोषक रूप में जाना जाता है।
भगवान बुध्द की प्रतिमा सभी ने देखी होगी। सारी की सारी प्रतिमाये और चित्र उनकी ध्यान मुद्रा में है। कितने प्रतिशत बौध्द ध्यान लगाने पर जोर देते है? ध्यान से जो उर्जा मिलती है उसका प्रयोग सारे संसार के साधक उपयोग कर रहे है। आज कई नई संस्थाये प्रयोग करती देखी जाती है, और अपने नाम पर मेडिटेशन का प्रचार करती है। जैसे आर्ट आफ लीविंग, पांतंजली योग पीठ आदी। ध्यान या मेडिटेशन के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने का तरिका बुध्द ने ही मानव जाति को सिखलाया था। इतनी विलक्षण पूंजी को क्या बौध्द आंदोलन के लोग प्रचारित करते देखे जा‍ते है। ये एक ऐसी पूंजी है जिसपर बुध्द का ही कापीराईट है। बावजूद इसके बौध्द प्रचारक इसका प्रचार नही करते। बौध्द प्रचारकों का बौध्द धर्म प्रचार करने का मुख्य आधार होता है हिन्दू धर्म खराब है इसलिए इसे छोडो़। जबकि प्रचार का कारण ये होना चाहिए बौध्द धर्म में ये ये अच्छाइयां है इसलिए इसे अपनाओं। किसी भी प्रचार के तरिके सकारात्मक होंगे तो परिणाम ज्यादा अच्छे आयेगे।
समतावादी आंदोलन की हवा में कुछ संस्थाये उभरी जैसे बामसेफ, आरपीआई, एम्बस, बीएसपी आदि। इन सभी का विचार संस्थागत तौर पर चलता है। यदि उनके प्रमुख ने ये मान लिया की एफडीआई गलत है तो सभी सदस्य बिना किसी दिमाग को खर्च किये ये रटेगे की एफडीआई गलत है। यहां मै किसी बात का समर्थन या विरोध नही कर रहा हूँ। मैं सिर्फ ये बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि इस आंबेडकरी आंदोलन में किसी व्यक्ति के विचार को सुन कर बताया जा सकता है की वह किस संस्था से ताल्लुख रखता है।

अभिजात्य वर्ग की शिकायत रही है कि आरपीआई, बामसेफ जैसी कई अम्बेडकरवादी संस्थाये टुकड़ो में बंट गई। जब वे स्वयं साथ नही रह सकती तो अपने समाज को क्या जोड़ सकेगी। शिकायत बिल्कुल सही है। लेकिन ये प्रश्न मूहबांये खडा है कि ये संस्थाये आपस में एक होकर क्यो नही रह सकी। इसका उत्तर सिर्फ एक है वह ये की इन्होने कभी भी आम्बेडकर की नही माना, न ही इन्होने बुध्द को माना। क्योंकि इन्होने हमेशा नकारात्मकता का ही प्रचार किया। आम्बेडकर कभी भी ऐसे नही थे। न बुध्द ने ऐसे प्रचार को तरजीह दी। इन्होने नकारत्मक को सकारात्मकता से ढांक दिया। एक आम आदमी को दो वक्त की रोटी सुख और शांती चाहिए। क्या समतावादी आंदोलन आम आदमी की आखरी दो जरूरतो को पूरा कर सकता है। यदि नही तो वह व्यक्ति जिसके पास न रोटी है, न सुख, न शांती उसके लिए आपकी नकारात्मक बाते किसी बकवास से कम नही । उसे सकारात्मक बातें अपनी ओर खींचती है क्योकि उसमें उर्जा है शांति है और उसमें वह अपना भविष्य देखता है।
समयांतर मार्च 2015 अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 16 जून 2015

भारत में रेप संस्कृति के सामाजिक ताने बाने

  • संजीव खुदशाह
 16 दिसंबर 2012 चर्चित दिल्ली रेप केस की आग अभी पूरी ठंडी हुई ही नही थी की 19 अप्रैल 2013 को एक पांच साल की बच्ची के साथ रेप होने का मामला सामने आया। ज्ञातव्य है कि यह बच्ची 15 अप्रैल को ग़ायब हुई। बच्ची के माता पिता थाने में शिकायत करने गये तो दिल्ली पुलिस ने उन्हे 6 घंटे थाने में बिठाये रखा। तीन दिन बाद 17 अप्रैल को बच्ची बंद कमरे में रोती पाई गई। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने बच्ची के मां बाप को 2000/- देते हुए कहा कि शुक्रमनाओं बच्ची जिंदा मिली है, अब केस बंद करो मीडिया को नही बताना। भारतीय पुलिस (सिर्फ दिल्ली पुलिस नही) अपनी दरिन्दगी की पराकाष्ठा में यहां मौजूद है। यह बताते हुए मेरे पेन कि श्याही क्यो नही खत्म हो गइ की उस बच्ची के नाजुक हिस्से में दो मोमबत्ती एक शीशी पाई गई। इसके बाद प्रदर्शन के दौरान एक लड़की पुष्पा को .सी.पी. ने थप्पड़ मार कर गिरा दिया।
यहां मेरा मकसद प्रचलित रिवाज के अनुसार पुलिस को कोसना नही है। क्योंकि पुलिस भी आरोपी मनोज की तरह भारतीय पुरूष ही है, जो औरत को एक भोग्या ही मानता है उससे ज्यादा कुछ नही। मेरा मकसद भारत में रेप संस्कृति के जड़ तक पहुँचना है।  अगर आपको ये जानकारी दू की 16 दिसंबर प्रकरण में यही मनोज बलात्कार के खिलाफ केण्डल लेकर दिल्ली के इण्डिया गेट में घुमा करता था, तो शायद आपको आश्चर्य नही होना चाहिए। क्योंकि पुलिस को कोसना, बेरिकेटस तोड़ना, नारेबाज़ी करना, केण्डल लाईटस जुलूस में शामिल होना यदि रेप की समस्या से उबरने का उपचार होता तो अब तक रेप की घटनाओं का नामोंनिशा खत्म हो चुका होता। ये कैसे माना जा सकता है कि केण्डल जुलूस में कोई भी पुरूष ऐसा नही होगा जो किसी लड़की को गलत इरादे से स्पर्श नही किया होगा। या दुष्कर्म का प्रयास नही किया होगा। क्या केण्डल जुलूस में शामिल होना, रेप के विरोध में टीवी के सामने हाय तौबा करना, इस बात के प्रमाण है की वे अब रेप नही करेगे। इसी प्रकार ऐसी हजारों केडल लेकर नारे लगाती लड़कियाँ होगी जिन्होंने अपने भाई, पति, पिता की ऐसी गलतियों पर पर्दा डाल रखा है। लेकिन आज ऐसी हजारों भेड़िया-भेड़िनियां मासूमियत का मुखौटा लगाकर नारे लगाने में व्यस्त है। अब भेड़िये और मासूमों के बीच की लकीर महीन होकर मिट गई है। भेड़िये केण्डल लेकर तुरंत मासूमों की जामात में शामिल हो जाते है। हम क्यों नही मानते की दरिंदा हम सब में हे, वो हम, आप कोई भी हो सकता है। दरिंदा हमारी संस्कृति में वर्षो से रचा बसा है। आईये देखे प्राचीन ग्रन्थ रेप की वकालत किस प्रकार करते है।
महाभारत आदिपर्व, अध्याय 122 में पाण्डु ने कुन्ती से क्या कहा
अनावृताः किल पुरा स्त्रिय आसन् वरानने।।
कामचार विहरिण्यः स्वतन्त्र श्चारूहासिनी।।4।।
तासां व्युच्चारमाणानां कौमरात् सुभगे पतीन।
ना धममोंऽभूद्वरारोहे हि धम्र्मः पूराभवत्।।5।।
अर्थः हे सुंदरी! पूर्व काल में स्त्रियों को कुछ रोक टोक थी। हे सुहासनी! उन दिनों वे स्वतंत्र रहकर भोग विलास की आषा में स्वच्छन्दता पूर्वक घूमा करती थी।।4।। हे सुभगे! वे कौमारावस्था से ही व्यभिचार करती थी और इससे उनको अधर्म नही होता था, क्योंकि वही पूर्व काल का धर्म था ।।5।।
इसके बाद पाण्डु ने दुष्कर्म को सही ठहराने के लिए श्वेतकेतु की कथा कही। श्वेतकेतु के सामने ही कोई ब्राह्मण उसकी माता का हाथ पकड़कर उसे बल पूर्वक किसी अन्य स्थान पर कुकर्म करने के लिए खींचने लगा। इस अनुचित कार्य को देखकर मारे क्रोध के श्वेत केतु के ओठ कापने लगे। तब उसके पिता उद्धालक ने कहा
मा तात कोपं कार्षीस्त्वमेष धम्र्मः सनातनः।
अनावृता हि सर्वेषां वर्णनामंगना भुवि।
यथागावः स्थितास्तात स्वेस्वे वर्णे तथा प्रजा।।14।।
अर्थः हे तात्! क्रोध मत करो, यही सनातन धर्म है। इस भू मंडल में सभी वर्णों की स्त्रियां बिना किसी बंधन के है। सभी जन अपने अपने वर्ण के साथ उसी प्रकार व्यवहार करते है जैसे गाये।।14।।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि संतानहीन पाण्डु, पुत्र प्राप्ती हेतु अपनी पत्नी को नियोग के लिए तैयार कर रहे है। स्पष्ट है नियोग और कुछ नही ऋषियों से बलात्कार है इसलिए कुन्ती को दुष्कर्म के पक्ष में तर्क दिये गये। इस प्रकार कोटिल्य शास्त्र से लेकर विभिन्न ग्रन्थो में ऐसे सैकड़ो संदर्भ भरे पड़े है जो परोक्ष अपरोक्ष रूप से दुष्कर्म की वकालत करते है।
क्या आज का भारतीय समाज इन शास्त्रों (किताबों) को दरकिनार करने की हिम्मत रखता है। हमारे पाणीग्रहण एवं निकाह की पध्दती कन्या को वस्तु का दर्जा देती है और कमजोर बना देती है। क्या हम इन रीति रिवाजों को तोड़ने की ताकत रखते है। वर्षो से ऐसी किताबें गांव-गांव प्रचारित कि गई है जो नारी को ढोल, गवार और पशु का दर्जा देती, क्या कभी इन किताबों की होली जलाने की हिम्मत करेगी भारतीय नारी, मुझे लगता है भारत की प्राचीन रेप संस्कृति में बदलाव नही हो सकता। चाहे पूरा देश केण्डल मार्च करे, मीडिया आसमान सिर पर उठा ले। क्योंकि घर-घर गांव गांव शहर शहर, भागवत कथा, नवधा रामायण की कथा, पौराणिक धारावाहिकों के माध्यम से युवा वर्ग यही तो सीख रहा है। उसके मन का नायक वही है जिन्हाने वस्त्रहीन नहाती महिलाओं के कपड़े चुराये, जिन्होंने वृन्दा, अहिल्या के साथ दुष्कर्म किया।
दरअसल केण्डल लिए ये लोग कभी नही चाहेंगे की उनकी इस सामंती संस्कृति में बदलाव आये, क्योकि यही वह संस्कृति है जहां पीड़िता में ही दोष निकाला जाता है। और दोषी को वीर माना जाता है। पुलिस तो बेचारी इसी संस्कृति का पालन कर रही है। उसका दोष कैसा आखिर वे भी तो इसी संस्कृति में रचे बसे लोग है।
अब हम कह रहे है कि 16 दिसंबर के बाद इतना केण्डल मार्च किया प्रदर्शन किया फिर भी दुष्कर्म बंद नही हुआ। हम ये कैसे मान ले कि दुष्कर्मी नायक की पूजा करने वाली महिला का भाई पिता पति दुष्कर्म नही करेगा। प्राकृतिक नियम के अनुसार वह अपने आदर्श का अनुसरण करने में जरा भी नही हिचकेगा। यही नियम भारतीय महिला पर भी लागू होगा यदि उसका नायक वही दुष्कर्मी होगा तो उसकी नजर में दुष्कर्मी भाई, पिता, पति भी एक नायक की तरह होंगे की एक बलात्कारी। दरअसल भारतीय जन मानस व्यक्तिवादी जीवन जीता है की समाजिक उसके बगल में रेप हो तो वह अपने आप को भाग्यशाली समझता है की उसके घर ऐसा नही हुआ। इस लिए रेप सहित कोई भी समाजिक बुराई खत्म नही हो सकी। रेपिस्ट से सिर्फ उसे लड़ना होता है जिसके साथ घटना हुई। बांकि उसे ताने देने हेतु मुस्तैद रहते है।
दुष्कर्म के मामले में एक महत्वपूर्ण और चैकाने वाला तथ्य यह है कि ज्यादातर बलात्कार दलित बहुजन स्त्रियों पर ही होते है। और उसे दबाने के लिए लोकतंत्र के चारो खंभे समान गति से कार्य करने लगते है। 16 दिसंबर की घटना में पिड़िता का नाम जग जाहिर  नही किया गया लेकिन दलित बहुजन चिंतको ने ये आशंका व्यक्त की थी ये इस रेप को मीडिया हाथो ले रहा है तो ज़रूर पिड़िता सर्वण वर्ग की होगी। बाद में यह बात सामने आई की उसका संबंध पाण्डे परिवार से रहा है। मीडिया ने उसे साहसी दामिनी जैसे जाने कैसे कैसे उप नामों से नवाजा, और तो और अमेरिका ने भी पुरस्कार की घोषणा कर दी। जबकि असल जिंदगी की दामनी साहसी दलित फुलन देवी को कभी इस प्रकार तवज्जो नही दिया गया। दरअसल ये सभी खंभे उन पुराने शास्त्रों का पालन कर रहे है की संविधान का।

 भला हो उस अंग्रेजों के कानून का जिसने रेपिस्ट को अपराधी ठहरा दिया, नही तो आज भी रोज हजारों रेप के मामले महज 2 या 3 हजार रू के लेन देन में निपटा दिये जाते। शायद इसलिए सनातनवादी लोग और मीडिया हमेशा पाश्चात्य को कोसती रहती है क्योंकि अब उनके अययाशी के रास्ते बंद हो रहे है।