सोमवार, 19 नवंबर 2018

Know how valuable your vote


जानिए कितना बहुमूल्य है आपका वोट
संजीव खुदशाह
भारत के ग्रामीण मतदाताओं में वोट के प्रति जागरूकता शहरी मतदाताओं के वनिस्पत कुछ ज्यादा होती है। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत ज्यादा होता है और शहर के क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत कम होता है। इसके कुछ कारण है, शहरी मतदाता पढ़ा लिखा सक्षम होने के बावजूद कुछ भ्रम पाले हुए रहता है। जिसके कारण वह वोट डालने नहीं जाता है आइए जाने वह कौन कौन सी वजह है।
1 शहरी मतदाता यह जो जानता है की उसका वोट बहुमूल्‍य है लेकिन वह यह सोचता है कि यह वोट उसी को दूँगा जो पर्सनली उसके पास मिलने के लिए आएगा अन्यथा मैं वोट किसी को नहीं दूंगा। यह अभिमान शहरी मतदाताओं में होता है।
2 उसे यह भ्रम होता है कि- मैंने अगर वोट नहीं दिया तो क्या होगा ? सभी लोग वोट देंगे मेरे एक वोट से कुछ होने जाने वाला नहीं है।
3 कई बार उसकी सोच रहती है कि - उस दिन डिसाइड करेंगे वोट देना है या नहीं। समय मिला तो वोट देंगे नहीं मिला तो नहीं देंगे। आलस्य के भावना।
4 कुछ उल्‍झन का बहाना होता है जैसे- मुझे मालूम नहीं है कहां पर वोट देने जाना है। मतदाता सूची में मेरा नाम है या नहीं?
5 कभी वह अहंकारी हो जाता है सोचता है कि - वोट देने चला भी जाऊंगा तो मेरे जैसा व्यक्ति जिंदगी में कभी भी लाइन में खड़ा नहीं हुआ है। मैं लाइन में क्यों खड़े हो ऊंगा।
6 संकोच करता है - मुझे किससे पूछना है कि मेरा मतदान केंद्र कहां पर है। सूची में कहां पर मेरा नाम है। इसके संकोच के कारण शहरी लोग वोट देने नहीं जा पाते हैं।
जबकि मतदान संबंधी पूरी जानकारी चुनाव आयुक्‍त द्वारा इस वेबसाइट में मुहैया कराई गई है कोई भी व्‍यक्ति अपने नाम मतदान केन्‍द्र वोटर आई डी की जानकारी आसानी से ले सकता है1
पूरे देश के किसी भी राज्‍य के लिए https://eci.nic.in/eci_main1/Linkto_erollpdf.aspx,
इन तमाम कारणों से वह वोट देने नहीं जाता है। और फिर बाकी के 5 साल कोसता रहता है अपने ही प्रतिनिधियों को, कि वह फलां काम नहीं करते हैं। उन्होंने यह काम गलत किया है। और ऐसा होना चाहिए था। गलत आदमी चुना गया। जबकि वह स्‍वयं वोट न देकर अपनी जिम्‍मदारी नही निभाता है।
राजनीतिक पार्टी शहरी मतदाताओं को प्रेरित करने में उदासीनता
ज्यादातर ऐसा माना जाता है कि शहरी पढ़ा लिखा मतदाता अपने विवेक और ज्ञान का प्रयोग करके मत दान देते हैं। और किसी भी लालच जैसे दारू साड़ी कपड़ा आदि में ना आकर विवेक के आधार पर वोट देना पसंद करते हैं। इस कारण राजनीतिक पार्टियां शहरी मतदाताओं को वोट डालने के लिए ज्यादा प्रेरित नहीं करती है। क्योंकि ग्रामीण मतदाताओं के वनिस्पत शहरी मतदाताओं के पास उम्मीदवारों के संबंध में ज्यादा जानकारी होती है।
शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस जागरूकता की कमी
ज्यादातर यह माना जाता है कि शहरी मतदाता जागरूक होता है। लेकिन सोशल मामलों में या कहें मतदान के मामलों में शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस की कमी होती है। ज्यादातर पॉश इलाकों में मतदान का प्रतिशत बेहद कम होता है, जहां पर बुद्धिमान और रसूख वाले लोग बसते हैं। वहीं दूसरी ओर शहर के ही स्लम और झुग्गी झोपड़ी वाले एरिया में मतदान का प्रतिशत अधिक होता है।
चुनाव आयुक्‍त जागरूकता मुहिम
चुनाव आयुक्‍त के द्वारा मतदान के प्रति मतदाता की रूची बढाने के लिए विज्ञापन फलैक्‍स नुक्‍कड नाटक रैली का प्रयोग किया जा रहा है, और मतदान हेतु प्रेरीत करने में कोई कसर नही छोड़ी जा रही  है।
आपका एक वोट क्या क्या कर सकता है
कुछ मतदाता यह समझते हैं कि उनके एक वोट देने नहीं देने से क्या फर्क पड़ेगा। दरअसल उनका एक वोट जितने उम्मीदवार खड़े हैं। उन सभी को प्रभावित करता है। मान लीजिए 15 उम्मीदवार हैं। तो आपका एक वोट जिसे आप दे रहे हैं उसे आगे बढ़ाए गा और इतनी ही संख्या में वोट बाकी  उम्मीदवारों से कम हो जाएंगे। क्‍योकि वोट की संख्‍या निश्चित होती है।
आपने अपना वोट नहीं दिया तो क्या होगा
यदि आपने अपना वोट नहीं दिया है तो एक गलत उम्मीदवार चुना जा सकता है। एक अच्छा उम्मीदवार चुनने से महरूम हो सकता है। योग्‍य उम्‍मीदवार आपकी समस्‍याओं को समझ सकता है, जनहीत के मुद्दो को शासन के समक्ष उठा सकता है। वहीं यदि कोई भ्रष्‍ट उम्‍मीदवार विजयी होता है तो वह जन विरोधी  कार्य करेगा, जनता को आपस में लड़वायेगा, दंगे करवायेगा, जनता द्वारा जमा किये टैक्‍स के पैसे का दुरुपयोग करेगा, अपन घर भरेगा। यदि आप अपना वोट नोटा को भी देते हैं तो भी यह संदेश जाता है कि मौजूदा उम्मीदवारों में से कोई भी आपको पसंद नहीं है। लोकतंत्र में आपको हर प्रकार से अपनी बात को रखने का मौका मिलता है और वोटिंग या चुनाव प्रथा लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है।

भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जब पढ़ा-लिखा और समझदार मतदाता मत डालने के लिए भारी संख्या में निकलता है तो लोकतंत्र में अप्रत्याशित परिणाम आते हैं। आईये हम भारत के एक एक मतदाता यह सुनिश्चि‍त करे की वे अपना वोट जरूर दे और भारतीय लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान करे।                   



रविवार, 22 जुलाई 2018

तेजिंदर गगन का जाना


तेजिंदर गगन का जाना
संजीव खुदशाह
वरिष्ठ पत्रकार  प्रभाकर चौबे के दिवंगत होने की खबर का अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था की खबर आई, तेजिंदर गगन नहीं रहे। मुझे याद है तेजिंदर गगन से मेरी पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी। वह एक राज्य संसाधन केंद्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम था। जिसमें वह बतौर साथी वक्ता पहुंचे थे। वहां एक महिला वक्ता ने अपने वक्तव्य के दौरान महिलाओं को दोयम दर्जे में रखे जाने की वकालत कर रही थी और सारे श्रोतागण स्तब्ध होकर सुन रहे थे। वह महिला किसी कॉलेज में प्रोफेसर थी मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा है।
लेकिन जैसे ही तेजिंदर गगन के अपने वक्तव्य देने की बारी आई तो उन्होंने अपने वक्तव्य के प्रारंभ में ही कहा कि मेरी 62 साल की आयु में पहली बार किसी महिला को इस तरह के वक्तव्य देते हुए देखा है। यह एक दुर्भाग्य है की आज भी सार्वजनिक तौर पर ऐसी बातें कही जा रही है। वह भी एक महिला के द्वारा। उन्होंने बड़ी विनम्रता से अपनी बात को रखा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ इस प्रकार उनसे मेरा मिलने जुलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया।
प्रसंगवश बताना जरूरी है कि वे दूरदर्शन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे। तेजिंदरजी ने देशबंधु से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में वे बैंक पदस्‍थ रहे और फिर आकाशवाणी और दूरदर्शन में लंबे समय तक कार्यरत रहे. इस दौरान उन्होंने रायपुरअंबिकापुरसंबलपुरनागपुरदेहरादूनचैन्नई व अहमदाबाद केंद्रों में अपनी सेवाएं दीं. उनके उपन्यास काला पादरीडायरी सागा सागासीढ़ियों पर चीता इत्यादि बहुचर्चित हुए।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अनटोल्ड नाम की एक अंग्रेजी पत्रिका प्रकाशित कर रहे थे। जो वेबसाइट में भी उपलब्ध है। वे इस पत्रिका में वंचित समुदाय के दुख दर्द को पर्याप्त स्थान देते थे। वह रायपुर में तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय थे और लगभग हर कार्यक्रम में दिखाई पड़ते थे। उनकी बेहद सरल ढंग से अपनी बात रखने की शैली ने पाठकों और दर्शकों को प्रभावित कर रखा था। वे बहुत बड़ी बड़ी बातों को भी बहुत ही सहजता से बोलते थे।
हाल ही में उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन छत्तीसगढ़ की ओर से सप्तपर्णी सम्मान से नवाजा गया था इसी सम्मान की श्रृंखला में इन पंक्तियों के लेखक को पुनर्नवा पुरस्कार से नवाजा गया। मुझे बेहद गर्व था कि उनके साथ मुझे भी सम्मानित किया गया। क्योंकि वह एक सुप्रसिध्‍द उपन्यासकार थे ।
उन्हें उनके उपन्यास काला पादरी के लिए बेहद प्रसिद्धि मिली। काला पादरी समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है। ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है। ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है। अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मे शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है। ‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है। निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है।
 वह कविताएं निबंध भी लिखा करते थे उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों पर चोट तथा प्रगतिशीलता की झलक मिलती थी। फिलहाल वे संस्मरण लिख रहे थे और मुझे बताया था कि कुछ संस्मरण वे प्रकाशन के लिए भी भेज रहे हैं। इसे किताब के रूप में प्रकाशित करने की योजना भी है। गौरतलब है कि मासिक पत्रिका हंस में भी उनके संस्‍मरण प्रकाशित हुये है।
वे अक्‍सर कहा करते थी की उन्‍हे वामपंथ एवं अंबेडकरवाद की समझ उनके नागपुर पदस्‍थापना के दौरान हुई। वे चीजों को बहुत ही गहराई से देखते थे। अपने किसी भी वकतव्‍य में इस बात का बखूबी ख्‍याल रखते की किसी को बुरा न लगे। इसलिए वे विनम्रता से अपनी बात रखते थे। मरेी उनके साथ पत्रिका अनटोल्‍ड के प्रकाशन के संबंध में कई बार सम्‍पर्क हुआ लेकिन कई कारणों से पत्रिका का सतत प्रकाशन नही हो पाया।
उनका जाना साहित्‍य के लिए अपूर्णीय क्षति जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

आंबेडकर जयंती पर विशेषः डॉ. आंबेडकर और उनका वैज्ञानिक चिंतन


आंबेडकर जयंती पर विशेष
डॉ आंबेडकर और उनका वैज्ञानिक चिंतन
संजीव खुदशाह
अक्सर डॉ आंबेडकर को केवल दलितों का नेता कहकर संबोधित किया जाता है। ऐसा संबोधित किया जाना दरअसल उनके साथ ज्यादती किया जाने जैसा है। ऐसा कहते समय हम भूल जाते हैं कि उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की थी। हम भूल जाते हैं कि उन्होंने हीराकुंड जैसा विशाल बांध का निर्माण समेत दामोदर घाटी परियोजना और सोन नदी परियोजना जैसे 8 बड़े बांधो को स्थापित करने मे महत्वपूर्ण कदम उठाया। हम भूल जाते हैं कि उन्होंने संविधान की समानता मूलक धर्मनिरपेक्ष आत्मा को रचने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। हम यह भी भूल जाते हैं कि उन्होंने लोकतंत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग का गठन करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हम उन्हें केवल दलितों का नेता कहकर उनके योगदानों पर पानी फेर देते हैं।
यदि विचार के दृष्टिकोण से देखें तो उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा है उनका वैज्ञानिक चिंतन। उन्होंने एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया एक ऐसा दृष्टिकोण जो अंधविश्वास और पाखंड से परे हो। उन्होंने सबसे पहले जाति उन्मूलन की बात रखी और बकायदा उसका एक खाका तैयार किया जिसे हम जाति उन्मूलन किताब के नाम से जानते हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र पर कई महत्वपूर्ण किताबे लिखी जिनमें से एक प्रसिद्धि किताब को प्रॉब्लम ऑफ रूपी के नाम से जाना जाता है।
आजादी के पहले महात्मा गांधी जब एक ओर नमक (स्वाद) के लिए लड़ाई कर रहे थे वहीं दूसरी और डॉक्टर अंबेडकर वंचित जातियों के लिए पीने के पानी की लड़ाई लड़ रहे थे। वहीं दूसरी ओर जब छोटी-छोटी रियासतें अपनी हुकूमत बचाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष कर रही थी। तो डॉक्टर अंबेडकर इन रियासतों ऊंची जातियों से पिछड़ी जातियों के जानवर से बदतर बर्ताव, शोषण से मुक्ति की बात कर रहे थे।  महात्मा फुले के बाद वे ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूरे विश्व पटल में जातिगत शोषण का मुद्दा बड़ी ही मजबूती के साथ पेश किया। दरअसल दलित और पिछड़ी वंचित जातियों का मुद्दा विश्व पटल पर तब गुंजा जब उन्होंने गोलमेज सम्मेलन के दौरान जातिगतआर्थिक और राजनीतिक शोषण होने की बात रखी। बाद में इन मुद्दों को साइमन कमीशन में जगह मिली। पहली बार दबे कुचले वंचित जातियों को अधिकार देने की बात हुई।
उन्होंने देखा कि भारतीय महिलाओं को एक दलित से भी नीचे दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता था। चाहे वो कितनी भी ऊंची जाति से ताल्लुक रखती हो। उन्हें ना तो अपने नाम पर संपत्ति रखने का अधिकार था ना ही पुरुष के समान उठने-बैठने, पढ़ने का। सामाजिक या सार्वजनिक तौर पर उनकी बातें नहीं सुनी जाती थी। डॉ अंबेडकर ने महिलाओं के लिए शिक्षा नौकरी पिता की संपत्ति में भाइयों के समान अधिकार तथा मातृत्व अवकाश के द्वार खोलें। खासतौर पर हिंदू कोड बिल में उन्होंने महिला और पुरुष को एक समान अधिकार दिए जाने की पुरजोर कोशिश की। बहुपत्‍नी प्रथा को गैरकानूनी बनाया।
 यहां पर उनकी उपलब्धि‍ को गिनाना मकसद नही है। मकसद है उनकी आधुनिक भारत में प्रासंगिकता पर गौर करना। उन्‍होने जो राय, अखण्‍ड भारत के संबंध में रखी थी वह बेहतद महत्‍वपूर्ण है। वे कहते है की आज का विशाल अखण्‍ड भारत धर्मनिरपेक्षता समानता की बुनियाद पर खड़ा है, इसकी अखण्‍डता को बचाये रखने के लिए जरूरी है की इसकी बुनियाद को मजबूत रखा जाय। वे राजनीतिक लोकतंत्र के लिए सामाजिक लोकतंत्र महत्‍वपूर्ण और जरूरी मानते थे। भारत में जिस प्रकार गैरबराबरी है उससे लगता है कि समाजिक लोकतंत्र आने में अभी और समय की जरूरत है। संविधान सभा के समापन भाषण में वे कहते है। ‘’तीसरी चीज जो हमें करनी चाहिएवह है कि मात्र राजनीतिक प्रजातंत्र पर संतोष न करना। हमें हमारे राजनीतिक प्रजातंत्र को एक सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहिए। जब तक उसे सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिलेराजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता। सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ क्या हैवह एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो स्वतंत्रतासमानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करती है।"
उनके अनुसार धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह है कि राजनीति से धर्म पूरी तरह अलग होना चाहिए। राजनीति और धर्म के घाल मेल से भारत की अखण्‍डता को खतरा हो सकता है। वे भारत में नायक वाद को भी एक खतरा बताते है संविधान सभा के समापन भाषण में कहते है कि दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिएवह है जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को ध्यान में रखनाजो उन्होंने उन लोगों को दी हैजिन्हें प्रजातंत्र को बनाए रखने में दिलचस्पी हैअर्थात् ''अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए।''
उन महान व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने में कुछ गलत नहीं हैजिन्होंने जीवनर्पयत देश की सेवा की हो। परंतु कृतज्ञता की भी कुछ सीमाएं हैं। जैसा कि आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल ने खूब कहा है, ''कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकताकोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।'' यह सावधानी किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक हैक्योंकि भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती हैउस भूमिका के परिणाम के मामले में दुनिया का कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता हैपरंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।‘’
जाहिर  है डॉं अंबेडकर की चिंता केवल समुदाय विशेष के लिए नही है वे देश को प्रबुध्‍द एवं अखण्‍ड देखना चाहते है। उनका यह प्रयास संविधान तथा उनके विचारो से स्पष्‍ट होता है। आशा ही नही पूर्ण विश्‍वास है कि देश उनके वैज्ञानिक चिंतन से सीख लेता रहेगा और तरक्‍की करता रहेगा।

रविवार, 25 मार्च 2018

Personality of the week Rajendra Gaikwad



लेखक और केंद्रीय जेल अधीक्षक श्री राजेंद्र गायकवाड बता रहे हैं कि किस प्रकार वह साहित्य और जेल के बीच सामंजस्य बैठाते हैं। वह यह भी बताते हैं कि पिछले साल कैदियों ने श्रम करके दो करोड़ रुपया कमाया। इसमें से आधी रकम उन पीड़ितों को दी गई जिन्हें इन कैदियों के द्वारा हानि पहुंचाया गया था। देखिए राजेंद्र गायकवाड़ का यह महत्वपूर्ण वीडियो।

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शनिवार, 17 मार्च 2018

स्टीफन हॉकिंग - जो हार कर भी जीत जाये


स्टीफन हॉकिंग - जो हार कर भी जीत जाये
संजीव खुदशाह
‘’वे लोग जिन्हें उनके IQ पर बहुत घमंड होता है, वे दरअसल हारे हुए लोग होते हैं.’’
‘’मैंने नोटिस किया है कि ऐसे लोग जो यह विश्वास करते हैं कि वही होगा जो भाग्य में लिखा होगा, वही सड़क पार करने से पहले सड़क को गौर से देखते हैं.’’
स्टीफन हाकिंग के विचार
ऐसा माना जाता रहा है कि अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अब तक सबसे अधिक मानव बुद्धि का प्रयोग किया था। वे एक महान वैज्ञानिकों में गिने जाते रहे है। हमें इस बात पर इठलाना चाहिए कि हमने ऐसे वक्त को जिया है जब उन्ही के समकक्ष वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंन भी इसी धरती में सांसे ले रहे थे। आज भले ही वे इस दुनिया में नही है। लेकिन उनके कई वैज्ञानिक अनुमान (भविष्यवाणी नही) उनके जीते जी ही पूरे होते रहे है। वे हमेशा दुनिया को अपनी रिसर्च से चौकाते रहे है।
दरअसल पूर्व भौतिक वैज्ञानिक अल्बर्ट आंइस्टाईन से उनका नाम जुडना ही स्टीफन हाकिंग के लिए एक महत्‍वपूर्ण घटना थी। वे बिग बैग थ्योरी एवं ब्‍लैक होल थ्‍योरी के कारण पूरे संसार में प्रसिध्द‍ हो गये। हिगस बोसोन  के रिसर्च के दौरन उनके अनुमानो के सही होते ही वे फिर चर्चा में आ गये, की ईश्वर कण जैसी कोइ चीज नही है।
प्रसंग वश  बताना जरूरी है कि स्टीफन हाकिंग का जन्म 8 जनवरी 1942 को इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड  में हुआ था । जब स्टीफन हाकिंग का जन्म हुआ तो वो बिलकुल स्वस्थ्य और सामान्य थे। उनके पिता का नाम फ्रेंक और माता का नाम इसोबेल था। उनकी दो बार शादी हुई तथा उनके तीन बच्चे है।
उनके जीवन का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि वे महज 21 साल की उम्र में एक असाध्य बीमारी से ग्रसित हो गये जिसका नामAmyotrophic Lateral Sclerosis [ALS ]था।  इस बीमारी में ग्रसित व्यक्ति का स्नायु तन्त्र से नियंत्रण खत्म होने लगता है जिससे उसके शरीर के हिस्से धीरे धीरे काम करना बंद कर देते है। अंत में श्वसन तन्त्र भी काम करना बंद कर देता है जिससे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। डॉक्टरों ने कहा की उनकी मृत्यु 2 वर्ष के भीतर हो जायेगी। लेकिन वे इससे डरे नही और अपना ध्यान अध्ययन पर लगाने लगे। उनका शरीर धीरे धीरे काम करना बंद कर दिया। लेकिन उनकी बीमारीवहीं रुक गई। वे अपने दांये गाल एवं आंख के सहारे यंत्रो की मदद से वार्तालाप कर पाते थे। मस्तिष्‍क के  साथ साथ उनका कुछ अंग ही सक्रिय था।
इस वैज्ञानिक ने यह सिध्द कर दिया की इस दुनिया में कोई भी विकलांग नही होता। विकलांग होती है मनुष्य‍ की सोच, उन्होने अपनी सभी शारीरिक कमियों को धत्ता  बताते हुये कई महत्वपूर्ण खोज की। दरअसल स्टीफन हॉकिंस,गैलीलियो और अल्बर्ट आइंस्टाइन के ही पंक्ति के वैज्ञानिक है। ग़ौरतलब है कि गैलीलियो और अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अपने वक्त के धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी थी एवं उनके अवैज्ञानिक सोच पर सवालिया निशान खड़ा किया था। गैलीलियो को तो धार्मिक लोगों ने आजीवन कारावास की सजा दी और वही उनकी मौत भी हो गई। आइंस्टाइन के साथ भी धार्मिक लोगों का संघर्ष चलता रहा। हलाकि बाद में आइंस्टाइन के कई उपदेश को तोड़ मरोड़कर ज़बरदस्ती धर्म के पक्ष में प्रचारित किया गया।
ठीक इसी प्रकार स्टीफन हॉकिंस भी अपने तमाम खोजों के बाद यह सिद्ध करते रहे की धार्मिक या भगवान जैसी चीजें बेवकूफी भरी हैं। आस्था से विज्ञान का कोई नाता नहीं है। चाहे मामला हिग्स बोसोन का हो या बिग बैंग थ्योरी का या फिर ब्रह्मांड की उत्पत्ति का। इन तमाम मुद्दों पर उन्होंने जो पेपर पेश किए उसमें उन्होंने इस बात को खुलकर बताया की विज्ञान का आधार अवलोकन तथा कारण है जबकि धर्म का आधार आस्था और अंधविश्वास है। वे हमेशा धार्मिक लोगों के निशाने पर रहे है। वह निश्चित रूप से भविष्य में अपने वैज्ञानिक सोच के लिए जाने जाएंगे और जैसे-जैसे मानव धार्मिक आडंबरों अंधविश्वासों से मुक्त होता जाएगा। वैसे वैसे उनके लिए गैलीलियो, अल्बर्ट आइंस्टाइन तथा स्टीफन हॉकिंग का महत्व भी बढ़ता जाएगा। हॉकिंग की सरलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक ओर वे सुदूर अंतरिक्ष के रहस्य सुलझाते हैं तो दूसरी ओर टीवी पर भी नजर आते हैं। ब्रिटेन के कई चैनलों ने उन्हें लेकर कई लोकप्रिय प्रोगाम बनाए हैं। 
स्टीफन हॉकिंग अपने वैज्ञानिक खोज के लिए तो हमेशा याद के जाएंगे ही साथ में विकलांग लोगों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत होंगे। उन्होंने अपने जीवन काल में यह सिद्ध कर दिया कि विकलांगता किसी भी मनुष्य की कमजोरी नहीं बन सकता। दरअसल विकलांग वे हैं जिन्होंने अपने आप को सीमित कर लिया हो और यह समझने लगे की उन्हे  सब पता है ज्ञानी है।
Publish in navbharat 17 march 2018
दुख की बात यह है कि स्टीफ़न हॉकिंग के मौत के तुरंत बाद कट्टरपंथी धार्मिक लोग उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष को धर्म के पक्ष में प्रचारित करने का प्रयास कर रहे हैं। जैसे हिग्स बोसोन को ईश्वर कण बताना। धर्म की उत्पत्ति को ब्रह्मांड से जोड़ना तथा उनके जन्म तथा मृत्यु दिवस के संबंध में अन्य  वैज्ञानिको के जन्म मृत्यु  से जोड़ना आदि। बावजूद इसके वे हमेशा तर्कशील लोगो, भौतिक विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान के प्रेरणा बने रहेंगे।
स्टीफन हॉकिन्स की महत्वपूर्ण किताबें
ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम
द ग्रांड डिजाइन
यूनिवर्स इन नटशेल
माई ब्रीफ हिस्ट्री
द थ्योरी ऑफ एवरीथि‍ग

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सामाजिक बहिष्कार पर रोक कैसे हो?

सामाजिक बहिष्कार पर रोक कैसे हो?
संजीव खुदशाह
हमारे देश में अनेक जातियां उपजातियां है जिनके अलग-अलग कानून कायदे और रूढ़ियां है तथा उन समाज के सामाजिक दबंगों का एकछत्र राज चलता है। परंपराओं वा रीति-रिवाजों को जबरजस्ती मनवाने ना मानने पर सामाजिक बहिष्कार का सिलसिला चलता है। बाद में बहिष्कृत व्यक्ति से दारु, मुर्गी, बकरा, मोटी रकम वसूल कर शुद्धिकरण पश्चात समाज में पुनः मिलाया जाता है। जो की पूरी तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। सामाजिक बहिष्कार समाज के दबंगों का ऐसा हथियार है, जो उसी समाज के किसी व्यक्ति या परिवार का जीवन बर्बाद कर देता है। जहां एक पीडि़त परिवार दाना पानी रोजगार के लिए तरसता है। इसके लिए स्‍पष्‍ट कानून नही होने के वजह से पीडि़त को न्‍याय मिलना कठिन हो जाता है।
वर्तमान में जातीय कट्टरता बढ़ी है। इसके साथ-साथ सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं भी बढ़ी हैं। इसका प्रमुख कारण है आज के राजनैतिक हालात, दरअसल आज का समाजिक नेता जिसे मैं जातीय नेता या दबंग कहना ज्यादा पसंद करूंगा। अपने समाज के लोगों को समाजिक सदस्य के रूप में नहीं बल्कि एक वोटर के रूप में देखता है। इसीलिए उसे अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। ताकि समय अनुसार राजनीतिक पार्टी या नेताओं के सम्मुख उसे भुनाया जा सके। दरअसल वोट के जातीय गणित की बुनियाद भी यही है। यह मुद्दा तो बहुसंख्यक जाति के बजाय मंझोली जाति यह अल्पसंख्यक जाति में इसके इतर जातीय पहचान बनाने की भी मंशा रहती है। जातीय नेता का लक्ष्य बहिष्कार के नाम पर अपने दुश्मन को ठिकाने लगाना, निजी हित तलाशना या समाज में अपना डर पैदा करना रहा है। यदि समाजिक बहिस्‍कार समाज के हीत में होता तो बलात्‍कारी, हत्‍यारे एवं अपराधियों को समाज से बहिस्‍कृत किया जाता। लेकिन ऐसा होता नही ज्‍यादातार बहिस्‍कार मुडन नही कराने, पैर नही छूने, गैरजाति में विवाह करने, कोई असाध्‍य बिमारी हो जाने, समाजिक नेता से बैर होने पर किया जाता है।
केवल गरीब या लाचार का ही बहिष्कार क्यों किया जाता है?
प्रत्येक मामले का गहन अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि जाति का बहिष्कार उस समाज के कमजोर व्यक्ति का ही किया जाता पाया जाता है। मुझे एक घटना याद आ रही है एक समाज के विधायक के बेटे ने गैर समाज की बेटी से प्रेम विवाह किया और आलीशान शादी की। गांव में अपने समाज को भी नहीं बुलवाया, बावजूद इसके उनका सामाजिक बहिष्कार नहीं हुआ। सामाजिक नेता उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे। दूसरी ओर ऐसे हजारों मामले हैं जिनमें वही समाज अंतर्जातीय विवाह होने पर समाजिक व्‍यक्ति को दंडित किया गया और सालों समाज से बहिष्कृत रखा।
सामाजिक बहिष्कार रोकथाम कानून का मतलब रीति रिवाज या रूढ़ियों परंपराओं को तोड़ना नहीं है
कुछ लोगों में यह भ्रम है कि सामाजिक बहिष्कार कानून लागू होने का मतलब उनके रीति रिवाज रूढ़ियों का नामोनिशान खत्म होना। जबकि यह गलत है रीति-रिवाज मनुष्य की इच्छा पर निर्भर होने चाहिए ना की किसी के द्वारा थोपा जाना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति मृत्यु पर मुंडन नहीं करना चाहता, तो कानून उसे यह अधिकार देता है कि वह मुंडन ना कराएं। उसका यह कानूनी अधिकार छीनने का हक उसकी जातीय पंचायतों को भी नहीं है। समाजिक बहिष्‍कार का मतलब समाज को जोड.ना नही उसे तोड़ना है। बहिष्‍कृत व्‍यक्ति अक्‍सर संगठित होकर नया समाज का निर्माण कर लेते है।
क्‍या गांव की पंचायत और जाति पंचायत न्यायपालिका का काम हाथ में लिए हुए हैं?
सामाजिक बहिष्कार का डर दिखाकर ग्रामीण पंचायत कानून को ठेंगा दिखाती है। स्‍थानीय ऐसे गांव में मेरा जाना हुआ। उस गांव के मुखिया ने कहा हमारा गांव एक आदर्श गांव है। यहां 20 सालों से कोई पुलिस के केस दर्ज नहीं हुआ। कोई कोर्ट में नहीं गया। मैंने पूछा-तो आपके गांव में बलात्कार, हत्या, आत्महत्या, लड़ाई झगड़े नहीं होते होंगे? तो उन्होंने बड़ी दबंगई से बताया- होते सब हैं लेकिन हम ऊपर तक पहुंचने नहीं देते। सब यही निपटा लेते हैं। मैंने पूछा- कैसे? तो उन्होंने उदाहरण बताया - पिछले दिनों एक 40 साल के आदमी ने 16 साल की लड़की से बलात्कार किया। वह गर्भवती हो गई। लड़की को मां-बाप थाना ले जाने वाले थे। हमने उन्हें रोका पंचायत बैठाई और फैसला सुना दिया कि लड़की उस आदमी के साथ रहेगी या फिर हम तुम्हें गांव से बहिष्कृत कर देंगे। फिर क्या था उन्हें बात माननी पड़ी। थानेदार भी हमारे गांव की तारीफ करते हैं कि यहां से कोई केस बाहर नहीं जाता।
 यानी जिस बलात्कारी को 7 साल की सजा कानून के अनुसार होनी थी, जातीय पंचायत ने उसे पुरस्कार स्वरूप उस नाबालिक लड़की को ही सौंप दिया। दरअसल जिन गांव में प्रकरण थाने नहीं जाते इसका मतलब यह भी हो सकता है की वहां कि‍ जातिय पंचायते मजबूत है तथा कानून को पैरों तले रौंदकर अपना न्यायालय चला रही है। डॉं अंबेडकर कहते है कि समाजिक बहिष्‍कार मौत से भी बदतर सजा है। पीडि़त का पूरा परिवार तिल तिल कर मरता है।
हमारा इतिहास रहा है कि हमने कई दकियानूसी प्रथाओं का रोकथाम करके, अपनी आने वाली पीढि़ के लिए एक खुशहाल वातावरण तैयार किया है। आशा है भविष्‍य में भी ऐसा ही होगा। छत्‍तीसगढ में प्रस्तावित इस कानून का स्‍वागत किया जाना चाहिए। ताकि यह प्रदेश एक प्रगतिशील एवं खुशहाल प्रदेश की श्रेणी में सबसे आगे हो।
Publish on navbharat 13/12/2017

रविवार, 12 नवंबर 2017

Is Ravana Really a symbol of evil?


 क्या रावण सचमुच बुराई का प्रतीक है? 
संजीव खुदशाह
मुझे इस पर लिखने का ख्‍याल तब आया, जब कॉलोनी के एक WhatsApp ग्रुप पर ब्राह्मण मित्र ने मैसेज भेजा उसका मजमून कुछ इस तरह था की रावण ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता था। बावजूद इसके उसे प्रति वर्ष बुराई का प्रतीक कहकर जलाया जाता है। यह ब्राम्‍हण के साथ शोषण जैसा है। यदि यही रावण किसी दलित या ओबीसी जाति का होता, तो लोग उसके विरोध में खड़े हो जाते। और रावण को जलाने का उत्सव मातम में बदल जाता हम यदि वाल्‍मीकि रामायण की माने तो रावण सारस्‍वत ब्राम्‍हण पुलस्‍त्‍य ऋषि के पौत्र एवं विश्रवा ऋषि के पुत्र थे।
मैं आज इस पर बात करना चाहता हूं। इस बात पर नहीं कि रावण ऐतिहासिक है या नहीं । या सचमुच उसका जन्म नरक चौदस के दिन हुआ था या नही।  मैं इस पर भी बात नहीं करूंगा की रावण की जाति क्या रही होगी। मै इस विषय पर बात करूंगा कि रावण को क्यों जलाते हैं? उसका मकसद क्या है? और कौन लोग रावण को जलाते हैं?
आजकल बहुजन-अंबेडकर वादियों के बीच रावण को मूल निवासियों का राजा कहकर प्रचारित किया जा रहा है। दरअसल यह ब्राह्मण वादियों के समानांतर बेहद जातिवादी सिद्धांत है। जब आप किसी जातिवादी सिद्धांत को मानते हैं तो आप केवल जाति को ही मानते हैं। सिद्धांत आपके लिए कोई मायने नहीं रखता। बहुजन मूवमेंट में भी यही बातें जोरों से घर कर रही हैं। कई मिथको को अपनाया जा रहा है उन्‍हे नये शिरे से गढा जा रहा है। इसके पहले महिषासुर पर भी बहुजन आंदोलन जोरों पर था। कुछ लोग जो इन बातों को थोड़ा बहुत समझते रहे हैं वह आरोप संघ के माथे पर मढ़ कर कान में रूई डालकर सो जाते।
अब मैं उस WhatsApp पोस्ट की तरफ पुनः जाना चाहूंगा जो एक ब्राम्हण मित्र ने ग्रुप में भेजी थी। दरअसल उस पोस्ट ने मुझे हद तक परेशान कर दिया। और यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया की ब्राम्हण कुमार रावण को आखिर जलाया क्यों जाता है। मैंने अपने अपने स्तर पर इसकी तहकीकात की। ऐतिहासिक स्तर पर जांच पड़ताल की। तो मुझे यह बात छनकर सामने आती हुई नजर आई की दरअसल यह लड़ाई किसी जाति के विरोध के बजाय सच के साथ झूठ की है। और यह लड़ाई आज भी चल रही है। मैं अगर संकुचित शब्दों में कहूं तो ब्राह्मणवाद की लड़ाई यथार्थवाद से चल रही है। यहां पर आप ब्राह्मणवाद को सीधे किसी जाति से जोड़ कर ना देखें। अगर आप ऐसे दृष्टिकोण से देखेंगे तो आप भ्रमित हो जाएंगे और सच्चाई का पता लगाने में मुश्किल आएगी।
दशहरे के समय तमाम ब्राम्हणवादी मीडिया, ब्राह्मणवादी लोग रावण को बुराई एवं अहंकार का प्रतीक कहकर और राम को सच्चाई का प्रतीक कहकर प्रचारित करते हैं। और रावण की हत्या को जायज ठहराते हैं। मैं काफी समय पहले से यह कहता आया हूं कि ब्राह्मणवादी लोग जातिवादी नहीं होते हैं। जातिवादी होते हैं गैर ब्राह्मणवादी लोग। ब्राह्मणवादी लोग केवल ब्राम्‍हण एवं ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मानते हैं। ब्राम्हण जाति को नहीं। यदि एक शूद्र, ब्राह्मणों की उच्चता, एवं उनके अंधविश्वास को स्‍वीकारता है, तो वह उसे सिर आंखों का पर बैठाते हैं। लेकिन एक बहुजन वादी लोग एक ब्राह्मण की प्रगतिशीलता को देखते हैं। तो उसको शंका की निगाह से देखते हैं उसे तिरस्कृत करते हैं। वही दूसरी ओर एक ब्राम्हण वादी व्यक्ति अपने विचारधारा पर इतना अडीग होता है की यदि स्वयं ब्राम्हण भी उसका विरोध करेगा तो उसे, उस का सर कलम करने में तनिक भी देरी नहीं लगाएगा। अब मैं आपको बताना चाहूंगा की राम जाति से क्षत्रिय था। लेकिन ब्राम्‍हण की उच्‍चता को स्‍वीकारता था। इसीलिए ब्राह्मणों ने उसे सिर आंखों पर बिठाया और नायक बना दिया। वही रावण वंश के हिसाब से ब्राह्मण था। लेकिन यथार्थवादी था। ब्राह्मणवाद का विरोधी था। तो उन्हीं ब्राम्हणों ने उसकी हत्या करवाई और उसे राक्षस घोषित कर दिया। यही नहीं प्रतिवर्ष उस ब्राम्हण व्यक्ति रावण के पुतले को जलाया जाता है। इतना धृणित व्‍यवहार तो ब्राम्‍हणो ने एक शूद्र से भी नही किया। मौत, दर साल मौत की सजा।
यह मामला यहीं तक नहीं रुकता या और आगे बढ़ता है। ब्राह्मणवाद के विरोधी जितने भी लोग रहे हैं। उन्हें खत्म किया जाता रहा है। चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों ना रहे हो। विगत कुछ सालों पहले चाहे वह नरेंद्र दाभोलकर की हत्‍या हुई वे ब्राम्हण जाति से ताल्‍लुख रखते थे। उसी प्रकार कलबुर्गी एवं गौरी लंकेश लिंगायत ब्राम्‍हण समप्रदाय से आते थे। बावजूद इसके ब्राह्मणवादियों ने इन्हें बर्दाश्त नहीं किया और इन तीनों प्रगतिशील तर्कशील विद्वानों को जान से हाथ धोना पड़ा। उसी प्रकार नरेन्‍द्र नायक प्रसिध्‍द तर्कशील विद्वान जो की चितपावन ब्राम्‍हण से ताल्‍लुख रखते है। उन्‍हे कट्टरवादियों द्वारा जान से मारने की धमकी दी गई है। इसी कड़ी में आप गांधी, कबीर, रयदास की हत्‍या को जोड़ सकते है।
रावण को प्रतिवर्ष जलाने का मकसद यह है की ब्राह्मणवाद यानी जाति से ब्राह्मण होना सर्वोपरि है यह दर्शाया जाए। साथ साथ शस्त्रधारी जाति क्षत्रिय, ब्राह्मणों की भक्‍त है। यह बात बार-बार सामने आए ताकि बाकी बनिया समेत शूद्र जातियां प्रश्‍न उठाएं और उसी तरह ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को मानते रहे। उन्हें कोई चुनौती ना दे सके। इसी कोशिश में प्रतिवर्ष प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यह ना सिर्फ पुतले का दहन है। बल्कि गैर ब्राह्मणवादी दुश्मनों को ललकार भी है। उनके भीतर भय पैदा करना भी है। ब्राह्मणवादी लोगों का मनोबल बढ़ाना भी है। और अंधविश्वास को स्थापित करना भी इसके पीछे एक महत्वपूर्ण मकसद है।

यहां पर, जैसा कि पिछले साल से एक परंपरा चालू हुई है। नरक चौदस के दिन रावण का जन्मदिन बहुजन और आंबेडकरी विचारधारा के लोगो मनाने की शुरूआत किया गया है। अगर वह यह सोच कर इस जन्म दिन को मनाने की शुरुआत कर रहे हैं की रावण असुर है, मूल निवासी है। तो मेरा ख्याल है कि यह एक धोखा होगा। बहुजन आंदोलन के साथ एक धोका होगा। यह धोका होगा स्वयं रावण के साथ। अगर हम यह जन्म दिन इस मकसद से मना रहे हैं की रावण एक यथार्त वादी एवं गैर ब्राह्मणवादी विचारधारा का व्यक्ति था, तो मैं यह समझता हूं की भविष्य में इसके पीछे कुछ सकारात्मक होने की गुंजाईश छुपी हुई है।

अगर बहुजन आंदोलन, अंबेडकरवादी आंदोलन अपने जातिवादी होने के दुर्गुण से निजात पा लें, तो इस संसार में ऐसी कोई ताकत नहीं है जो उन्हें रोक सकेगी। क्योंकि जिस प्रकार ब्राह्मणवादी होना किसी एक जाति की बपौती नहीं है। उसी प्रकार प्रगतिशील होना भी किसी खास जातियों का एकाधिकार नहीं है। इस बात को समझना होगा और जातिवाद से निकलकर सिद्धांतवाद की ओर जाना होगा। तब कहीं जाकर रावण की जयंती को मनाने का सही मकसद पूर्ण हो सकेगा।