गुरुवार, 17 मार्च 2016

विश्‍वविद्यालय की आंधी से किसको खतरा

विश्‍वविद्यालय की आंधी से किसको खतरा
संजीव खुदशाह
विगत दिनों देश में ज्ञानार्जन संस्‍थान विद्रोह और दमन के केन्‍द्र बने हुये है। हैदराबाद विश्‍वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्‍महत्‍या से ये मुआमला तूल पकड़ने लगा।  लेकिन यदि हम कुछ साल पीछे की  घटनाओं को गौर करे जैसे महाराष्‍ट्र के शिरडी में एक दलित छात्र की हत्‍या सिर्फ इस लिये कर दी गई क्‍योकि उसने मोबाईल पर अंबेडकर की रिंग टोन लगा रखी थी। उसी प्रकार मद्रास आई आई टी के अंबेडकर पेरियार स्‍टुडेन्‍ट सर्कील के छात्रो द्वारा सरकार की आलोचना करने पर उसे मानव संसाधन कार्यालय के निर्देश पर बैन कर दिया गया। प्रतिबंधित दल का कहना है कि वे जाति प्रथा आधारित भेदभावहिंदी भाषा थोपे जानेबीफ बैन और शिक्षा में आरक्षण जैसे मुद्दों पर सरकार की नीतियों से अपना मतभेद व्यक्त कर रहे थे और लेकिन उसे "घृणा फैलाने की कोशिश" बताया गया है. आईआईटी मद्रास पर पहले भी सालों से ब्राह्मणवादी रवैया" रखने का आरोप लगता आया है. एपीएससी के सदस्य मानते हैं कि उन्होंने कोई भी असंवैधानिक काम नहीं किया है।
(यहां ब्राम्‍हणवाद से तात्‍पर्य किसी जाति विशेष से नही बल्कि उस विचारधारा से है। जो अंधविश्‍वास, ऊंच-नीच, व्‍यक्तिवाद, जातिवाद, सामंतवाद, रंगभेद, लिंग भेद आदि को बढ़ावा देती है।)
विश्‍वविद्यालय में वैचारिक स्‍वतंत्रता पर हमले
यहां बताना आवश्‍यक है कि ब्रिटिश काल में हमारे देश के लोग आक्‍सफोर्ड ओर केम्‍ब्रीज में पढ़ने के लिए जाते थे। सावरकरजी भी वहां पढ़ने गये थे। वहां उन्‍होने प्रसिध्‍द किताब Indian war of Independence-1875 लिखा। वहां उनके द्वारा फ्री इंडिया सोसायटी की स्‍थापना किया गया । विश्‍वविद्यालय के भारतीय छात्र ब्रिटिश सरकार के दमन और भारत के स्‍वतंत्रता पर विचार विमर्श और गोष्ठियां करते थे। किन्‍तु ब्रिटिश सरकार या विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने कभी इन गतिविधियों को देश द्रोह के रूप में नही देखा।  जबकि उस वक्‍त भारत ब्रिटेन का अभिन्‍न अंग था।  इन विश्‍व विद्यालयों की लोकताँत्रिक व्‍यवस्‍था इसलिए महान है क्‍योकि उनकी मान्‍यता है कि विश्‍वविद्याल खुले विमर्श का धरातल है कोई निजी कोचिंग सेन्‍टर नही। विश्‍वविद्यालय को किसी विचार धारा विशेष धर्म विशेष के दायरे में बांध ने का अर्थ हे उसके प्रतिमानों को विमर्श को ज्ञान को संकुचित कर देना। इसलिए इसमे कोई आश्‍चर्य नही की विश्‍व की 100 चोटी के विश्‍वविद्यालयों में भारत का एक विश्‍वविद्यालय शामिल नही हो सका।
 दुनिया के किसी विकसित और लोकताँत्रिक देश के विश्वविद्यालयों को देख लीजिए। अमेरिका में तो तीन-तीन बड़े छात्र आंदोलन हो चुके हैं। सबसे पहला 1965 के अमेरिका-वियतनाम युद्ध के समय। इसमें मिशिगन यूनिवर्सिटी के छात्रों ने युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन किया। आपको पता होगा कि यह लड़ाई अमेरिका हार भी गया था। कोई देशद्रोह का केस नहीं हुआ। दूसरा 1965-73 में हुआ। लेकिन कोई देशद्रोह नहीं माना गया। तीसरा कोलंबिया यूनिवर्सिटी में साल 1968 में हुआ। दरअसल कुछ हथियार कंपनियों ने वियतनाम में अमेरिका को लडऩे के लिए उकसाया था। यह उनके खिलाफ था। इसमें भी अमेरिका विरोधी नारे लगाए गए। पर कोई केस नहीं दर्ज किया गया। फिर 2003 में पूरे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में इराक युद्ध के विरोध में प्रदर्शन हुए।
ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में तो बकायदे आयोजन होते हैं जिसमे सरकार और उसकी नीतियों की खुलकर आलोचना होती है,विमर्श होता है। कुछ लोग यह भी दलील देने लगे है कि जेएन यू जनता के टैक्स से चलता है। उनके लिए जवाब है कि जैसे जनता के पैसे से नेता लोगों को सुविधाएँ भोगने का हक है उसी तरह विश्वविद्यालयों को चलने का भीबल्कि यह तो शिक्षा पर खर्च हो रहा।
खतरा कन्‍हैया कुमार से है या कम्‍युनिष्‍ट विचार धारा से?
दरअसल  भारत में दो विचारधारा चल रही है एक मनुवादी विचारधारा दूसरी अंबेडकरवादी विचार धारा। मनुवादी विचार धारा जिसे हम ब्राम्‍हणवादी विचारधारा भी कहते है। ब्राम्‍हणवादी  विचारधारा से कभी भी गांधीवादी या समाजवादी विचारधारा से खतरा नही रहा है न ही वे कम्‍युनिष्‍ट विचारधारा से घबराये है। क्‍योकि भारतीय कम्‍युनिष्‍ट विचारधारा मनुवाद को बचाने का ही काम करता रहा है। ज्‍यादातर भारत के कम्‍यूनिष्‍ट  विचारक यही मानते रहे है की भारत मे जाति शोषण कोई समस्‍या है ही नही। यदि है भी तो पूंजीवाद और साम्राज्‍यवाद के खत्‍म हो जाने पर सब समस्‍या खत्‍म हो जायेगी। वे जानबूझ कर भारत में ऊँच नीच छुआ छूत को नजर अंदाज़ करते रहे क्‍योकि ये विचारक उन्‍ही शोषक तबके से आते थे। यानि वे किसी न किसी रूप में ब्राम्‍हणवाद को बचाने का काम करते रहे। लेकिन अब कम्‍युनिष्‍ट विचारधारा का एक धड़ा ब्राम्‍हणवाद को खत्‍म करने पर जोर दे रहा है।
देश में इसी तारतम्‍य में कई घटनाएँ लगातार घटी है महाराष्‍ट्र  में अम्‍बेडकरी रिंग टोन रखने पर छात्र की हत्‍यातमिलनाडु में अम्‍बेडकर पेरियार स्‍टुडेन्‍ यूनियन पर प्रतिबंधहैदराबाद में दलित छात्र रोहित वेमुला की तरह तरह से विश्‍वविद्यालय प्रशासन के द्वारा प्रताडि़त किया गया तत्‍पश्‍चात उसकी आत्‍म हत्‍या। इसके बाद जे एन यू छात्र संघ अध्‍यक्ष कन्‍हैया कुमार को रोहित के साथ खड़े होने पर देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में गिराफतारी।
इन घटनाओं को सिल सिलेवार देखने एवं उसका विश्‍लेषण करने पर एक खास  बात नजर आती है वह है अंबेडकर फूले पेरियार की विचार धारा । हालांकि कन्‍हैया कुमार जो कि जे एन यू छात्र संघ के अध्‍यक्ष है तथा भारतीय कम्‍युनिष्‍ट पार्टी के छात्र संगठन ए आई एस ए‍फ से चुन कर आये है।
कन्‍हैया को षडयंत्र में फँसाने का कारण
रोहित के मौत के बाद कन्‍हैया खुल कर प्रशासन का विरोध करता रहा वह आज़ादी के लगातार नारे भी लगाता रहा। उसके नारे है
ब्राम्‍हणवाद से आज़ादी, मनुवाद से आज़ादी, सामंतवाद से आज़ादी, रोहित हम शर्मिंदा है, द्रोणाचार्य अभी भी जिन्‍दा है। आदि आदि ।
इन आधारो पर उस पर देश विद्रोही होने का केस नही दर्ज किया जा सकता था। लेकिन मनु वादियों की जड़े हिल रही थी उन्‍हे लग रहा था कि यदि ऐसा चलता रहा तो वो दिन दूर नही जब यहां से ब्राम्‍हण वाद की अर्थी निकलेगी। भारत के इतिहास में पहली बार खुल कर ब्राम्‍हणवाद के विरोध में नारे लगे और ब्राम्‍हणवाद पर चर्चा हाने लगी। इसी बीच एक ब्राम्‍हणवादी मीडिया एक्‍सपर्ट शिल्‍पी तिवारी ने कन्‍हैया के नारे लगाने वाले वीडियो में छेड़छाड़ कीदेश विरोधी एवं पाकिस्‍तान के पक्ष में नारे लगाते ऑडियो को उस वीडियो मे फिट किया। सोची समझी साज़िश के तहत जी न्‍यूज समेत कुछ ब्राम्‍हणवादी चैनलों ने इसे खूब दिखाया ताकि कन्‍हैया एवं उसके साथियों को देश द्रोही साबित किया जा सके। आनन फानन उसे जेल में डाल दिया गया। उस पर देश द्रोह की धारायें लगाई गई। इस बीच मनु वादियों ने सोशल मी‍डिया पर खूब तांडव मचाया उस वीडियो को नये नये जुमले के साथ खूब शेयर किया । लोगो को गुमराह करने में कोई कसर नही छोड़ी। इस दरमियान कन्‍हैया का आोरिजिनल वीडियो सोशल मीडिया मे तैरने लगा। कुछेक इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने भी वीडियो के साथ की गई छेड़ छाड़ को विस्‍तार से दिखाया। कन्‍हैया रिहा हुआ और एक नये तेवर के साथ सामने आया।
इस घटना को कम्‍युनिष्‍ट पार्टी ने लेफ्ट के उभार के रूप में देखा। सीताराम येचुरी ने घोषणा तक कर दिया की कन्‍हैया कम्‍युनिष्‍ट पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करेगे। गौर तलब है कि कम्‍युनिष्‍ट पार्टी आफ इंडिया ने अब तक अपने पत्‍ते नही खोले है की वे हमेशा की तरह मनुवाद के पक्ष में रहेगा की कन्‍हैया की तरह अम्‍बेडकरवाद के पक्ष में। वे सिर्फ ये सोच रहे है की कन्‍हैया की लोकप्रियता का फायदा अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने मे कैसे करे।
शासन प्रशासन में बैठे ब्राम्‍हणवादी  लोग ये भली भॉंती जानते है की तर्क विमर्श से अंबेडकरवाद का मुकाबला नही किया जा सकता वे ब्राम्‍हणवाद को बचाने के लिए तीन ढाल का इस्‍तेमाल करते है। 1. संस्‍कृति के नाम पर 2. धार्मिक भावना के नाम पर 3. हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद के नाम पर।  इसलिए वे महिषासुर दिवस मनाये जाने पर घबराते है। इसलिए वे बीफ पार्टी के नाम पर कतराते हैइन्‍हे देश द्रोही साबित करने में तुल जाते है क्‍योकि उनको वास्‍तविक खतरा देशद्रोहियों से नही बल्‍की समतावादी विचारधारा अंबेडकरवाद से है। जो जाति भेदलिंग भेदरंगभेदक्षेत्र भेद को खत्‍म करने की बात करता है और इन भेद को खत्‍म करने का मतलब है मनु वादियों को मुफ्त की सुविधाएँमलाई मिलना  बंद  होना।
यह तो तय है की समता वादी विचार धारा की आंधी आ चुकी है। पिछले साल विभिन्‍न विश्‍वविद्यालय  समेत करीब 300 स्‍थानो में महिषासुर दिवस मनाया गया। मनुस्‍मृति दहन दिवस हर साल जोर शेार से मनाया जाता है। अम्‍बेडकर परिनिर्वाण दिवस में हर साल 20 से 30 लाख लोग चैत्‍य भूमि में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने जाते है। भले ही मीडिया इन्‍हे जगह न दे रहा हो लेकिन वे जानते है शिक्षण संस्‍थानो से ब्राम्‍हणवाद की जड़े हिलने लगी है।
कन्‍हैया कुमार बिहार की भूमि हार जाति से ताल्‍लुख रखते है प्रख्‍यात लेखक श्री रजनीकांत शास्‍त्री अपनी किताब हिन्‍दू जाति का उत्‍थान पतन में कहते की शास्‍त्रो के अनुसार भूमिहाल(भूमिहार) एक शूद्र जाति है। हालांकि जोत अधिनियम लागु होने के कारण ये जातियां सम्‍पन्‍न हो गई। भूमिहार अन्‍य छोटी जातियों की भांती कभी क्षत्रिय तो कभी ब्राम्‍हण हाने का दावा करती रही है। लेकिन क्षत्रिय या ब्राम्‍हण से इनके वैवाहिक संबंध नही बनाते है।
श्री रजनी कांत शा‍स्‍त्री लिखते है कि भूमिहाल शब्‍द सेजिसका अपभ्रंश भूमिहार शब्‍द बना। वे भूमि पृथ्‍वी लक्षणया क्षेत्र हलति हलयं क्षेत्र कर्पति इति भूमिहाल:भूमिहल (कर्षर्ण) अण्‍ कर्म्‍मण्‍यण 3/2/1 इति पाणिनि सूत्रस्‍थ प्रवृति रूप पद समास:’ का हवाला देते है।
जे एन यू समेत कन्‍हैया के अम्‍बेडकरी विचारधारा में आने की घटना को देश का विशाल समतावादी समुदाय बड़ी आशा की नजर से देख रहा है। उनमें एक शोषितो का नेता नजर आ रहा है। तो दूसरी ओर कुछेक लोग शंका की निगाह से भी देख रहे है। वे तर्क देते है कि जन समर्थन के लिए अंबेडकर का नाम लिया जा रहा है कन्‍हैया दबंग जाति से है उनका वास्‍तव में अंबेडकर से वास्‍ता नही है।
दरअसल विचार धारा किसी जाति या संप्रदाय की मोहताज नही होती जिस प्रकार ब्राम्‍हणवादी  होने के लिए ब्राम्‍हण होना जरूरी नही है। उसी प्रकार अम्‍बेडकरवादी होने के लिए किसी जाति विशेष में जन्‍म लेना जरूरी नही है। यह तो तय है कि जो बीज रोहित वेमुला ने बोया है वह तमाम विश्‍वविद्यालय में कन्‍हैया के रूप में फल फूल रहा है। यह आंधी अब चल चुकी है इससे खतरा सिर्फ और सिर्फ ब्राम्‍हणवाद को हैजो अपने आपको बचाने के लिए हिन्‍दू राष्‍ट्रवाददेशद्रोह जैसे ह‍थियार का प्रयोग करेगा। जिसकी पोल जे एन यू की घटना से पहले ही खुल चुकी है। ब्राम्‍हणवाद की कोशिश रहेगी की अम्‍बेडकरवाद, फूलेवाद, कम्‍युनिष्‍ट जैसी प्रेगतिशील विचार धारा कभी एक नह हो पाये।

शनिवार, 30 जनवरी 2016

धर्मांधता पर प्रहार

हम तेजी से एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं, जिसमें मतभेदों को तर्क और बहस से नहीं बल्कि गोलियों से सुलझाया जाता है
मेरे मोबाइल में वाट्सएप में कुछ महीनों पूर्व एक संदेश आया, जिसका शीर्षक था, ”भारत में विज्ञान ने जनेऊ पहन लिया और चुटिया रख ली है’’। संदेश में उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म के बोलबाले को उजागर किया गया था। इस संदेश का एक पैराग्राफ मैं उदृत करना चाहूंगा:
”गीता के 18वें अध्याय में प्रभु ने चार वर्णो की स्थापना की है और हर वर्ण के कर्तव्य बताएं है। ऐसा एक आईआईटी की साईट पर दर्ज है। लिंक खोलिये और पढिय़े।’’ उसी तरह दिल्ली आईआईटी के मुख्य द्वार के पास से गुजऱते हुऐ शनि मंदिर में विद्यार्थियों की भीड़ को देखकर आप सोच में पड़ जायेगें। हाय रे, भारतीय विज्ञान।
इस संदेश का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह दृश्य भारत के ऐसे उच्च शिक्षा संस्थान का है, जहां से निकले विधार्थी देश के सबसे अधिक प्रतिभाशाली व शिक्षित नागरिक माने जाते हैं। गौरतलब है कि इस संदेश में बताये लिंक (www.gitasupersite.iitk.ac.in/srimad) को जब मैने खोला तो पाया की संदेश में कही गई बातें बहुत हद तक सही हैं।
यह मुद्दा कितना गंभीर है इसका अंदाज़ा आप अंधविश्वास-विरोधी कार्यकर्ताओं की संघर्ष गाथाओं से कर सकते हैं, जिनमें से तीन को इस मुहिम में अपनी जानें तक गंवानी पड़ीं।

डॉं नरेन्द्र दाभोलकर (1 नवम्बर 1945 – 20 अगस्त 2013)

NarendraDabholkarडॉं नरेन्द्र दाभोलकर ‘महाराष्ट्र अंधविश्वास निर्मूलन समिति’ के संस्थापक एवं अध्यक्ष और ‘साधना’ के संपादक थे। वे तर्कवादी मराठी लेखक थे। वे साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ा नाम थे और महाराष्ट्र में नर बलि, जादू -टोना और काले जादू जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलनों के अगुआ माने जाते थे। उनके इस प्रयास को कुछ ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ संगठनों का विरोध भी झेलना पड़ा था। पुणे में दिन-दहाड़े अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी।
डॉ नरेन्द्र दाभोलकर के प्रयासों के चलते जल्द ही महाराष्ट्र सरकार विधानसभा में जादू टोना निरोधक विधेयक लाने जा रही थी। दाभोलकर पिछले 16 साल से काले जादू के खिलाफ एक कड़े कानून की मांग कर रहे थे।
दाभोलकर के नेतृत्व में ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ समाज की मानसिकता को बदलने एवं लोगों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए काम कर रही थी।
इस त्रासदी का एकमात्र सुखद पहलू यह है कि उनकी शहादत के बाद महाराष्ट्र विधानसभा ने अंधविश्वास विरोधी विघेयक पारित कर दिया। 2014 में उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अब यह देखना बाकी है कि अन्य राज्य कब तक ऐसे कानून लागू करते हैं।

गोविंद पानसरे (26 नवंबर, 1933 – 20 फरवरी, 2015)

govind-pansareकम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के वरिष्ठतम सदस्यों में से एक गोविंद पानसरे अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलते थे। पानसारे एक वैचारिक योद्धा थे और उन्होंने तकरीबन 21 किताबें लिखीं थीं। उनमें से सबसे ज्यादा चर्चित महाराष्ट्र के इतिहासपुरुष छत्रपति शिवाजी पर उनकी किताब ‘शिवाजी कौन होता?’ थी। इस पुस्तक में उन्होंने शिवाजी के बारे में सांप्रदायिक ताकतों द्वारा फैलाए गए झूठ का पर्दाफाश किया था। उनकी इस किताब की एक लाख से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं।
कोल्हापुर में अज्ञात हमलावरों ने पानसरे की हत्या कर दी। उनकी हत्या के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि पानसारे की हत्या के लिए प्रतिक्रियावादी ताकतों सहित पूरी व्यवस्था जिम्मेदार है। वे महाराष्ट्र में सांप्रदायिकता के खिलाफ भी काम कर रहे थे। वे भी दाभोलकर की तरह महाराष्ट्र में जागरूकता पैदा कर रहे थे। दोनों की हत्या तथाकथित प्रगतिशील तबके के लिए चुनौती है।

एमएम कलबुर्गी (28 नवम्बर,1938 -30 अगस्त, 2015)

mm kalburjiप्रख्यात चिंतक, हम्पी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व अंधविश्वास तथा मूर्तिपूजा के खिलाफ मुहिम छेडऩे वाले एमएम कलबुर्गी 77 वर्ष के थे। वे एक प्रसिद्ध विद्वान और शोधकर्ता थे तथा धार्मिक-सामाजिक समानता के पक्षधर थे। वे अपनी बेबाक और स्पष्ट टिप्पणीयों के लिए कई बार विवादों में घिर चुके थे। उन्हें केंद्रीय और राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाज़ा गया था। कलबुर्गी की 30 अगस्त, 2015 की सुबह कर्नाटक के धारवाड़ स्थित उनके आवास पर कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, सुबह 8.40 बजे उन्हें गोली मारी गयी और अस्पताल ले जाने के दौरन उनकी मृत्यु हो गयी।
हम तेजी से एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं जिसमें मतभेदों को तर्क और बहस से नहीं बल्कि गोलियों से सुलझाया जाता है।
बजरंग दल ने कलबुर्गी की हत्या को सही ठहराया और यह धमकी दी कि धर्म के विरूद्ध बोलने वालों की इसी तरह हत्यायें होंगीं। हालांकि धमकी देने वाले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन हत्यारे आज भी पुलिस की गिरफ़्त से बाहर हैं।

डॉं नरेन्द्र नायक

Narendra Nayakडॉं नरेन्द्र नायक मूल रूप से गोवा निवासी हैं लेकिन उन्होंने अपना अंधविश्वास-विरोधी अभियान कर्नाटक से प्रारंभ किया। वे मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की नौकरी छोड़ कर अपना पूरा जीवन आमजनों को विज्ञान के सिद्धांतों से परिचित करवाने और अंधविश्वास के खतरों के प्रति आगाह करने में व्यतीत कर रहे है। वे डॉं नरेन्द्रा दाभोलकरकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वे ‘भारतीय तर्कशील समाज’ के अध्यक्ष हैं। उन्होंने भारतीय टीवी चैनलों सहीत डिस्कवरी चैनल के लिए भी अंधविश्वास-विरोधी कार्यक्रम तैयार किये हैं। वे लगभग 16 भाषाएँ जानते हैं और विश्व भर में अपने कार्यक्रम करते हैं। उनकी जान को भी खतरा है। हाल ही में उन्होंने एक नये प्रकार के अंधविश्वास ‘मिड ब्रेन एक्टीवेशन’(तीसरे नेत्र को सक्रिय करना) का पर्दाफ़ाश किया है।

भंते बुद्ध प्रकाश

बिहार अल्पसंख्यक आयोग व साइंस फॉर सोसाइटी के पूर्व सदस्य, पटना निवासी भंते बुद्ध प्रकाश ने अंधविश्वास के खिलाफ पूरे देश में जंग छेड़ रखी है। वे पिछले कई वर्षो से देश के विभिन्न राज्यों में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने इस अभियान को ‘अंधविश्वास भगाओ, देश बचाओ’ का नाम दिया है।
किसी भी क्षेत्र में डायन-बिसाही की घटना या अन्धविश्वास-जनित अपराध की सूचना मिलने पर भंते बुद्ध प्रकाश वहांbudhprakash पहुंचते हैं और लोगों को जागरूक करते हैं ताकि घटना की पुनरावृति नहीं हो। बुद्ध प्रकाश का मानना है कि ओझा, बैगा व भगत आदि ही सर्वप्रथम किसी औरत को डायन की संज्ञा देते है और अन्य लोग उन पर विश्वास कर लेते हैं। किसी की मौत बीमारी या दुर्घटना से हो सकती है, भूत-प्रेत व डायन से नहीं। वे कहते हैं कि अंधविश्वास पीढ़ी दर पीढ़ी समाज में जड़ जमाए हुए है। व्यापक पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाकर ही इसे समाप्त किया जा सकता है। लोगों में वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा।
यह त्रासद और विडम्बनापूर्ण है कि भारत में लोकतंत्र होने के बावजूद वैज्ञानिक सोच के समर्थकों को इस तरह का संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसलए तलवार उन सब लेखको-पत्रकारों-वैज्ञानिको पर लटक रही है, जो धर्म के आगे घुटने नही टेकते, जो सच्चाई का दामन थामे हुये है और आम लोगो को आगाह कर रहे हैं। वरिष्ठ लेखक उदय प्रकाश ने कुलबर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है। ये सारे लेखक- आंबेडकरवादी, सत्यसशोधक, तर्कशील-अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नही हैं, क्योकि वे जानते है कि वे अंधविश्वास के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। 17वी शताब्दी में ऐसी ही लड़ाई यूरोप में लड़ी गई थी। इसके बाद वहां के लोग विज्ञान और धर्म के बीच फर्क करना सीख गये। इसके बाद यूरोप में एक नए युग की शुरुआत हुई, अविष्कारों और खोजों के युग की, ऐसे युग की, जिसने ज्ञान को नए आयाम दिए।
फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2015 अंक में प्रकाशित

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

बहुजन साहित्य की अवधारण

ओबीसी साहित्य की जरूरत
  • संजीव खुदशाह
चाहे इसे माने या न माने लेकिन ये बात तय है कि आज जो बहुजन साहित्य की अवधारणा की बात चली है उसके मूल में दलित साहित्य का कान्सेप्ट है। दलित साहित्य ने जिस मज़बूती के साथ साहित्य जगत में अपनी पैठ बनाई है उससे अन्य पीड़ित वर्ग निश्चित रूप से औचक है। और वह परोक्ष अपरोक्ष रूप से इस साहित्यिक मुहिम का हिस्सा बनना चाहता है। वह दलित साहित्य में दर्ज पीडा और विद्रोह को अपना समझता है लेकिन वह कोशिशों के बावजूद इसका हिस्सा नही बन सका। इसके कारणों पर मैं बाद में चर्चा करूगां। इसके पहले ये चर्चा जरूरी है कि बहुजन साहित्य की अवधारणा की जरूरत क्यो है?
मैं समझता हूँ बहुजन साहित्य की अवधारणा के दो महत्वपूर्ण कारण है पहला ओबीसी को दलित साहित्य में स्थान न मिल पाना। दूसरा सवर्ण (द्विज) साहित्य (वर्तमान में मुख्यधारा का साहित्य) में ओबीसी साहित्य की अभिव्यक्ति की संभावना शून्य होना। मै ओबीसी साहित्य की उपस्थिति का समर्थक हूँ लेकिन ये साहित्य दलित साहित्य से किस प्रकार भिन्न होगा फिलहाल इस पर बात करना जल्दबाजी समझता हूँ। तीसरा कारण है एक ऐसे सा‍हित्यिक छतरी का के निर्माण की आवश्यकता होना जिसमें सभी गैरब्राम्हणवादी साहित्य समाहित हो जाये।
प्रमोद रंजन कहते है बहुजन साहित्य की अवधारणा का जन्म फारवर्ड प्रेस के संपादकीय विभाग से हुआ। यह बात सही है कि हिन्दी बेल्ट में बहुजन साहित्य की अवधारणा का प्रचार प्रसार और उसका ‍िस्थरीकरण फारवर्ड प्रेस ने ही किया। और आज ये दलित-बहुजनो की एक महत्वपूर्ण पत्रिका के रूप में स्थापित हो चुकी है।
क्या दलित साहित्य से ओबीसी बाहर है ?
बहुजन साहित्य की अवधारणा के प्रश्न पर कुछ लोगो का तर्क है कि दलित साहित्य में ओबीसी को स्थान नही मिलने के कारण बहुजन साहित्य की अवधारणा की जरूरत पडी। यहां यह बताना जरूरी है कि दलित साहित्य के निर्माण या प्रकिया में कोई ऐसा नियम नही है। जिसमें ये कहा गया हो की इसमें केवल अनुसूचित जाति के लोग ही लिखेगे। न ही दलित का मतलब अनुसूचित जाति है। जबकि ग़ौरतलब है कि दलित साहित्य ज्यादातर ओबीसी सिध्दांतकारो के सिद्धांत पर ही खड़ा हुआ है। जैसे महात्मा फूले, ई रामास्वामी पेरियार, संत कबीर आद‍ि। दलित साहित्य में ओबीसी क्यो दूर है इस मुआमले मे  जय प्रकाश कर्दम के 2012 फारवर्ड प्रेस बहुजन वार्षिकी में छपे लेख को उदधृत करना चाहूगां। जिसमें वे लिखते है।
यह दिक्कत ओबीसी साहित्य की नही ओबीसी साहित्य कारों की है वे सवर्ण और दलित दोनो नावों पर एक साथ सवार होकर चलना चाहते है, जो संभव नही है। इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए कि सवर्ण साहित्य का पिछलग्गू बन कर उनको और उनके समाज को क्या मिला ? यदि वे स्वयं को दलित मानकर दलित समाज और साहित्य के साथ सच्चे मन से जुडे जो कोई वजह नही कि उनको दलित साहित्य में समुचित स्थान और सम्मान नही मिले। यदि वे पूरी निष्ठा से दलित साहित्य से जुडेगे तो दलित साहित्यकार के रूप में रहकर और जगह बनाने से उन्हे कोई नही रोक सकता। फारवर्ड प्रेस सिंतबर 2012 पृष्ठ क्रमांक 53
यह उल्लेखनीय है कि दलितों ने दलित साहित्य एवं विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए अपना खून तक बहाया है। ओबीसी के लिए मण्डल आयोग लागू होने पर आरक्षण का झंडा दलितों ने ही बुलंद रखा। दलितों ने सवर्णों के हमले को झेला जिनमें बहुसंख्यक ओबीसी थे। आज भी ओबीसी द्वारा दलितों पर होने वाले जातीय हमले पर दलित अकेला लड़ता है। गोहाना, झज्जर और खैरलांजी इसके उदाहरण है।  ओबीसी साहित्यकार मौन रहता है। यहां फर्क हम स्पष्ट देखते है कि दलित ओबीसी के दर्द को अपना दर्द समझता है लेकिन ओबीसी दलितों के दर्द में मौन हो जाता है। ऐसी स्थिति में ओबीसी और एस सी का एक साहित्यिक छतरी में आना कठिन दिखता है। यही कारण है आम एस सी यानी दलित ओबीसी को एक शोषक के तौर पर देखता है।
बहुजन साहित्य की अवधारणा में यही सबसे बड़ा रोडा है क्योंकि शोषक कभी पीड़ित नही हो सकता । यदि वह पीड़ित है और वह प्रतिरोध करना चाहता है तो इसकी सबसे पहली शर्त है वह शोषण बंद करे या उसका विरोध दर्ज करे।
बहुजन साहित्य के इतिहास पर चर्चा
कुछ लोग बहुजन साहित्य  (आशय ओबीसी साहित्य से है) को 600 ई-र्पू से प्रारंभ मानते है। वे कौत्य को वह व्यक्ति मानते है जिन्होंने भौतिक बुध्दि वाद से मिलता जुलता दर्शन प्रारंभ किया। वे तंतुवाय परिवार से संबंधित थे। यह बात अपनी जगह ठीक है। लेकिन वास्तव में बहुजन विचार धारा या साहित्य की शुरूआत बुद्ध से हुई। क्योंकि बुद्ध ने ही सर्वप्रथम बहुजन शब्द का प्रयोग किया था। इसलिए बुद्ध के सिद्धांत बहुजन साहित्य के मूल भूत सिद्धांत में शामिल होने चाहिए।
1.      वेदों क बकवास मानना
2.      ब्राम्हणी कर्म कांड यज्ञ आद‍ि को नही मानना।
3.      अनीश्वरवादी होना
4.      जातिप्रथा का विरोध करना।
 इस प्रकार बुध्द के सिद्धांत की एक फ़ेहरिस्त है जो मानववादी विचार धारा को पुष्ट करता है। इस प्रकार जुलाहा जाति में जन्मे कबीर भी दलित साहित्य के प्रर्वतक माने जा‍ते है। जबकि कबीर ओबीसी वर्ग से ताल्लुक रखते थे। मैं बहुजन साहित्य के असल निर्माता महात्मा फूले को मानता हूँ। जिन्होंने बुद्ध कबीर की परंपरा को पुर्नजीवित किया। गौरतलब है कि बुद्ध कबीर और फूले दलित साहित्य के मजबूत आधार स्तम्भ है। जबकि तीनों ओबीसी वर्ग से ताल्लुक रखते है। (बुध्द शाक्य जाति के है और शाक्य नागवंशी कृषक अनार्य जाति है, विस्तृत विवरण देखने के लिए आप इन पंक्तियों के लेखक की किताब आधुनिक भारत मे पिछड़ा वर्ग-पूर्वाग्रह मिथक एवं वास्तविकताएं बुद्ध की जाति पर प्रश्न पृष्ठ क्रमांक 71 का अवलोकन किया जाना चाहिए।)

वास्तविक ओबीसी कौन है?
ये जानकर बड़ा दुख होता है कि दलित साहित्य से बहुजन साहित्य क अलग अस्तित्व के पैरोकार साहित्यकार ये नही जानते क‍ि ओबीसी कौन है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह फारवर्ड प्रेस मार्च 2012 अंक में प्रकाशित लेख में ओबीसी विमर्श (बहुजन साहित्य) पर चर्चा के दौरान भारतेन्दु हरीशचंद्र, मैथिली शरण गुप्त तथा गांधी को ओबीसी बता कर फूले नही समाते है।
वे लिखते है परंतु हिन्दी के द्विजवादी आलोचको ने भारतेन्दु मैथिली शरण गुप्त, जय शंकर प्रसाद और रेणु जैसे ओबीसी रचना कारों के मुल्यांकन में ऐसा धुंध फैला रखा है कि वे चीजे हमें दिखाई नही पड़ती है। पृष्ठ 41 मार्च 2012 फारवर्ड प्रेस
एक जगह वे गांधी को ओबीसी बताते है
महात्मा गांधी बाबा साहेब अंबेडकर और राममनोहर लोहिया में दो गांधी और लोहिया ओबीसी बहुजन में आते है। जबकि अंबेडकर दलित है। गांधी को बहुजन होने पर गर्व है। इसलिए उन्होने अपनी आत्मकथा के आरंभ में लिखा है मै जाति का बनिया हूँ। पृष्ठ 42 मार्च 2012 फारवर्ड प्रेस
सभी जानते है कि किस प्रकार भारतेन्दु हरिशचंन्द्र मैथिली शरण गुप्त आदि ने द्विज साहित्‍य को पुष्ट किया। यह तथ्य भी सर्वविदीत है कि गांधी ने किस प्रकार साइमन कमीशन के मुआमले में अछुतो के अधिकार के विरूद्ध अनशन किया था। और अछूतों की हार के रूप में पूना पैक्ट का जन्म हुआ। गांधी वास्तव में द्विज वोट के समर्थक थे उनका मानना था कि इन्हे(आशय अजा अजजा और पिछड़ा वर्ग से है) वोट का अधिकार देने से वोट खराब होगा। उनका कहना था ये हिन्दुओ का आंतरिक धार्मिक मामला है इसे आपस में मिल बैठ कर निपटायेगे।
इसके बावजूद राजेन्द्र प्रसाद सिंह यह लिखते है
शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता आजीवको ने स्वीकारी थी। बुद्ध भी शारीरिक श्रम के पक्ष में है। कबीर और गांधी भी शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता को स्वीकारते है। कहने का मतलब यह है कि ओबीसी का कोई भी दार्शनिक विचारक अथवा चिंतक ऐसा नही है जिन्होंने श्रम के महत्व को नकारा हो। पृष्ठ 42 मार्च 2012 फारवर्ड प्रेस
यहां पर वे गांधी को ओबीसी का दार्शनिक बताते है। बहुजनों को इस प्रकार गुमराह होने से बचना जरूरी है। क्योंकि दलित बहुजन के दार्शनिक वही हो सकते है जो मन वचन और कर्म से दलित बहुजन के हितैषी हो भले ही वो इस समुदाय का न हो
प्रगतीशीलता का छद्म
यदि हिन्दी साहित्य को गौर से देखे तो पाते है ये साहित्य दो भागो में बांटा जा सकता है। एक ब्राम्हणवादी(द्विज) साहित्य जिसे हम आज मुख्य धारा का साहित्य कहते है इसमें भक्ति साहित्य भी शामिल है। दूसरा गैर ब्राम्हणवादी साहित्य जिसमें दलित साहित्य, निगुर्ण धारा का साहित्य, बहुजन साहित्य शामिल है।
ब्राम्हणवादी साहित्य यथा स्थितीवादी होकर प्रगतीशीलता का ढोग करता है। ब्राम्हणवादी लेखक (जो अज अजजा आबीसी भी हो सकता है) अपने साहित्य में सामाजिक रूढ़ियों पर चोट नही करता बल्कि उन रूढियों पर से आंखे मूंद लेता है। ब्राम्हणवादी साहित्यकार चापलूस होता है वह ऐसी कोई बात नही लिखता जिससे द्विज व्यवस्था नराज हो। उसे ऐसा लगता है कि इन्हे नाराज करने से व बहिस्कृत कर दिया जायेगा।
बहुजन अवधारणा का नायक
बहुजन साहित्य आज अपनी शैशव अवस्था में है लेकिन इसके नायक को लेकर आज भी संशय है। जिस प्रकार दलित साहित्य का नायक डा अंबेडकर है उसी प्रकार एक पथप्रदर्शक नायक बहुजन साहित्य में होने की आवश्यकता मै समझता हूँ। कही कही देखा गया है कि पौराणिक मिथकों को नायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश क गई है जैसे बलीराजा, हिषासुर, रावण आद‍ि। फारवर्ड प्रेस के प्रमुख संपादक श्री आईवन कोस्का साक्षात्कार के दौरान यह स्वीकार करते है कि इस प्रकार पौराणिक नायकों को बहुजन नायक के रूप में प्रतिस्थापित करना एक आत्मधाती कदम होगा। लेकिन लोगो का ध्यान आकर्षित करने तथा धार्मिक विरोध दर्ज करने तक यह बात ठीक है।
पौराणिक नायको को महत्व देने का मतलब है वेद पुराणो को जाने अनजाने महत्वपूर्ण बना देना। जब आप इन्हे महत्व देते है तो इस वैदिक जाल से निकलने का प्रश्न नही उठता। इतिहास गवाह है लालबेगी (सफाई कामगार) जाति ने 1920 के आस-पास वाल्मीकि को अपना गुरू बना लिया। आज वे अपने आपको चाह कर भी ब्राम्हणवाद की गिरफ़्त से आज़ाद नही कर पा रहे है। इसी काल में डोमार, हेला, एवं मखियार जाति (अन्य दलित जात‍ियां) सुदर्शन को अपना नायक बनाया, उनका भी यही हश्र हुआ।
बहुजन साहित्य को इन पौराणिक नायकों की कतई जरूरत नही क्योंकि बुद्ध से लेकर कबीर, फूले, चंदापूरे, ललईसिंह, कर्पूरी ठाकुर, पेरियार समेत कई दार्शनिक नायक है। जिन्हे बहुजन अपना नायक चुन सकते है। महात्मा ज्योतिबा फूले को बहुजन साहित्य के एक बहुत बडे हिस्से से नायक के रूप मे स्वीकृति मिल चुकी है। आईवन कोस्का बताते है की फूले और अम्बेडकर दोनो यूरोपियन विचारधारा से प्रभावित थे। उनके जीवन में इसाई विचारधारा और देश में कार्यरत मिशनरी के क्रियाकलापों का गहरा प्रभाव पडा।

बहुजन साहित्य की अवधारणा के नामाकरण को लेकर चर्चाये चल रही है। एक ऐसे नाम की आवश्यकता है जिसमें दलित साहित्य, ओबीसी साहित्य, आदिवासी एवं स्त्री साहित्य समाहित हो सके। स्पष्ट है कि बहुजन का सीधा अर्थ है बहुसंख्यक आबादी। इसका यह अर्थ कतई नही है जिससे यह मतलब निकाला जाय की बहुजन शोषित पीड़ित आबादी का नाम है। न ही ये शब्द किसी आंदोलन या संघर्ष का संकेत देता है। बल्कि आम भारतीय बहुजन साहित्य को राजनीतिक पार्टी बहुजन समाज पार्टी से जोड कर देखता है। इसलिए ऐसे साहित्यिक शब्दावली की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए जो सभी साहि‍त्यिक वर्गो को एक में समाहित कर सके। जैसे दलित बहुजन साहित्य, अम्बेडकरवादी साहित्य या फूलेवादी साहित्य इत्याद‍ि यहां मुझे दलित-बहुजन साहित्य शब्दावली इस अवधारणा के लिए उपयुक्त प्रतीत होता है। दलित बहुजन यानी शोषित बहुसंख्यक वर्ग जिसमें स्त्री पुरूष अल्पसंख्यक अजा अजजा ओबीसी सभी शामिल है। और यह शब्दावली एक बडे समूह द्वारा प्रयोग ‍किया जा रहा है। 
Publish in forward press

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

सुदर्शन समाज का इतिहास

सुदर्शन समाज की परिकल्पना का ऐतिहासिक परिदृश्य
सुदर्शन समाज का इतिहास
संजीव खुदशाह
मूलत: बघेलखण्ड और बुंदेलखण्ड (आज मप्र और उप्र के कुछ हिस्से) में निवास करने वाली डोमार जाति जो भंगी व्यवसाय में जुडी हुई है। ने अचानक 1941 के आस पास अपने आपको सुदर्शन नाम के पौराणिक ऋषि से जोड लिया। वे अपनी जाति की पहचान सुदर्शन समाज के रूप में बताने लगे। वे ऐसा क्यो करने लगे ? क्या कारण थे ? इसका जवाब बताने से पहले अन्य भंगी व्यवसाय से जुड़ी वाल्मीकि समाज के बारे में जानना जरूरी है।
1920 से 1930 ईस्वी के आस पास की बात है जब डाँ अंबेडकर दलितों के उद्धारक के रूप में उभरते जा रहे थे। वे दलितों को उत्पीङन से बचने के लिए गांव से शहर में आकर बसने की सलाह दे रहे थे साथ ही अपने पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़ने की अपील कर रहे थे। इस समय देश के लाखों दलित अपने घृणित व्यवसाय को छोड़कर शहर में अन्य व्यवसाय की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान पंजाब की चूहङा जाति(पखाना सफाई में लिप्त थी) के लोग जो बालाशाह और लालबेग को अपना धर्म गुरू मानते थे।  इनमें बडी मात्रा में ईसाई धर्म की ओर झुकाव हाेने लगा और जो लोग ईसाई धर्म को ग्रहण कर लेते वे गंदे काम को करना बंद कर देते। इसी समय पंजाब के लाहौर और जालंधर इत्यादि बडे. शहरों में आर्य समाज और कांग्रेसियों का प्रभाव था उन्होने गौर किया कि यदि ऐसा ही धर्म परिवर्तन चलता रहा तो पखाने साफ करने वाला कोई भी नही रहेगा। इन्हे हिन्दू बना ये रखने के लिए हिन्दुओं ने प्रचार शुरू किया कि तुम हिन्दू हो। बाला शाह बबरीक आदि को वाल्मीकि बनाया गया। उन्हे गोमांस न खाने को राजी किया गया। ऐडवोकेट भगवान दास अपनी किताब बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और भंगी जातियां में लिखते है बाला शाह बबरीक आदि को वाल्मीकि बनाया गया। उन्हे गोमांस न खाने को राजी किया गया। अपने खर्चे लाल बेग के बौद्ध स्तूपों की तरह ढाई ईट से बने थानों की जगह मंदिर बनाये जाने लगे। कुर्सीनामों की जगह रामायण का पाठ और होशियारपुर के एक ब्राह्मण द्वारा लिखी आरती ओम जय जगदीश हरेगाई जाने लगी। हिन्दुकरण को मजबूती देने के लिए पंजाब के एक ब्राह्मण श्री अमीचन्द्र शर्मा ने एक पुस्तक वाल्मीकि प्रकाशके नाम से छपवाई जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भंगी चुहडा वाल्मीकि का वंशज नही, अनुयायी है। उधर गांधी जी ने भी इस नये नाम की सराहना की और अपना आशीर्वाद दिया।
ग़ौरतलब है कि सन् 1931 में जाति नाम वाल्मीकि को सरकारी स्वीकृति मिल गयी। पंजाब हरियाणा के बाहर अन्य भंगी जातियां इससे प्रभावित नही हुई। किंतु इन जातियों के लोग भी इसाई और मुस्लिम धर्म की ओर बढ रहे थे एवं तरक्की कर रहे थे। जो व्यक्ति इसाई या मुस्लिम धर्म में चला जाता वह गंदे पेशे को छोङ देता। हिन्दु वादियों ने इन्हे भी एक-एक संत थोप दिया, और उस संत को उनका कुल गुरू बताया गया।, उनके बीच धार्मिक किताबे मुफ्त में बांटी गई, उन्हे कहा गया की तुम्हारे कुल के देवी देवता मरही माई, देसाई दाई, ज्वाला माई, कालका माई कोई और नही दुर्गा के ही अन्य नाम है, इस तरह इन गैर हिन्दु जातियों को हिन्दु धर्म में बिना दीक्षा के मिला दिया गया। कुछ जातियां स्वयं धार्मिक किताबों में अपने संतो की खोज करने लगे। इसके तीन कारण थे।
1.    लालबेगियों के द्वारा वाल्मीकि जयंती मनाने और सभा करने की प्रक्रिया को संगठित होना समझते थे। इस प्रकार वे भी संगठ‍ित होना चाहते थे।
2.    सरकार के द्वारा किसी प्रकार के फायदे मिलने की लालसा थी।
3.    गंदे जाति नाम से छुटकारा पाने की मजबूरी थी।

अब प्रश्न ये उठता है कि लालबेगियों की तरह उनकी भी जरूरते समान थी इसके बावजूद वे वाल्मीकि नाम से क्यो नही जुङे। इसके भी तीन कारण है।
1.   वे अपने आपको लालबेगियों से अलग मानते थे।
2.   वाल्मीकि नाम से जुडकर वे अपने जाति अस्तित्व को समाप्त नही करना चाहते थे।
3.   वाल्मीकि में लालबेगियों के एकाधिकार के कारण वे अपने हितों को लेकर असुरक्षित थे।
इस प्रकार बांकी भंगी जातियां अपने अपने गुरूओं की तलाश करने लगी। इस कार्य में हिन्दुवादियों ने अपना सहयोग दिया। धानुक जाति ने अपने आपकों धानुक ऋषि से, डोम ने देवक ऋषि से, मातंग ने मातंग ऋषि से और डोमरों ने सुदर्शन ऋषि से अपने आपको जोडा। चूकि चर्चा का विषय सुदर्शन समाज पर है इसलिए मै इस पर विस्तार से चर्चा करूगां।
सुदर्शन समाज की शुरूआत 1941 के बाद हुई ऐसी जानकारी मिलती है। स्व रामसिंग खरे जो डोमार जाति के थे, ने सर्वप्रथम सुदर्शन सेवा समाज की स्थापना पंश्चिम बंगाल के खडगपुर में की। स्व रामसिंग खरे के सहयोगी थे स्व भीमसेन मंझारे, स्व लालुदयाल कन्हैया, स्व रामलाल शुक्ला, स्व पन्ना लाल व्यास। यहां सुदर्शन सेवा समाज की ओर से एक स्कूल भी चलाया जा रहा था। बाद में मध्यप्रदेश के बिलासपुर (अब छत्तीसगढ.) में करबला नामक स्थान में एक सुदर्शन आश्रम की स्थापना उन्होने ने की। आज यहां पर एक बडा सुदर्शन समाज भवन नगर निगम की मदद से बनवाया गया है। इस बीच सुदर्शन समाज का सम्मेलन कानपुर, खडगपुर, नागपुर, जबलपुर एवं बिलासपुर में आयोजित किया गया। रामसिंग खरे मूलत: हमीरपुर बांदा के रहने वाले थे। वे खडगपुर में निवास करते थे लेकिन पूरे जीवन भर सुदर्शन ऋषि के नाम पर समाज को जोङने के लिए पूरे देश में दौरा किया करते थे। इसके पहले डोमार जाति सुदर्शन या सुपच ऋषि से परिचित नही थी।
ऐसी जानकारी मिलती है कि की स्व रामसिंग खरे बंगाल नागपुर रेल्वे में सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे, बाद में वे हेल्थ इंस्पैक्टर होकर सेवानिवृत्त हुये। उन्होने रेल सफाई कमर्चारियों की समस्याओं को लेकर कई कार्य किये। रेल सफाई कर्मचारियों के पद्दोन्ती का श्रेय उन्ही के प्रयास को जाता है। स्व पन्नालाल के पुत्र राजकिशोर व्यास बताते है कि  1940 से पहले वे अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली में गांधीजी से मिले थे। गांधी ने उनके सुदर्शन ऋषि के कान्सेप्ट को आर्शिवाद दिया था ऐसा अंदाजा लगाया जाता है। लेकिन सर्वप्रथम सुदर्शन ऋषि या सुपच ऋषि के बारे में उन्हे कोन बताया ये कह पाना कठीन है।
स्वपच क्या है? स्वपच का तत्सम श्वपच है। जिसका अर्थ कुत्ते का मांस खाने वाले लोग।
श्वान+पच= कुत्ते का मांस खाने वाले[1]
किन्ही अन्य संदर्भ में चांडाल को भी श्वपच कहा जाता है। यानि जिस किसी ने भी स्व रामसिंग खरे को सुपच या सुदर्शन ऋषि का कान्सेप्ट दिया था वो बडा ही घूर्त आदमी रहा होगा। क्योकि स्व रामसिंग खरे और उनके साथी ज्यादा पढे लिखे नही थे। यदि उन्हे ये जानकारी होती की सुपच का अर्थ कुत्ते का मांस खाने वाला है तो वे किसी भी हाल में सुदर्शन ऋषि को नही अपनाते।
सुदर्शन ऋषि की उत्पत्ति- यहां यह बताना जरूरी है सुदर्शन ऋषि के परोकार महाभारत के एक प्रसंग से सुदर्शन ऋषि को जोडते है। जिसकी कथा कबीर मंसूर में मिलती है की महाभारत युध्‍द के बाद युधिष्ठीर को अत्यन्त पश्चाताप हुआ कि उन्होने अपने ही रिश्तेदारो की हत्या कर यह राजपाट पया है जिसके कारण उन्हे नरक भोगना पडेगा। श्री कृष्ण ने उन्हे इस संकट से मुक्ति के लिए यज्ञ करने की सलाह दी, जिसमें सभी साधु-संतों को भोजन कराए जाने का निर्देश दिया और कहा कि जब आकाश में घंटा सात बार बजेगा तभी यज्ञ पूरा हुआ माना जाएगा अन्यथा नही। इस प्रकार सभी सन्तों को बुलाकर भोजन कराया गया, किन्तु कोई घंटा नही बजा। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण के कहने पर सुदर्शन ऋषि को बङी मिन्नत करके बुलाया गया एवं भोजन कराया गया। इसके बाद आकाशीय घंटा बजता है।[2] इसी प्रकार का विवरण सुख सागर नामक ग्रन्थ में भी मिलता है। गौरतलब है इस कथा में सुदर्शन को नीच जाति का बतलाया गया।
क्या महाभारत में सुदर्शन ऋषि का विवरण मिलता है? यह एक आश्चर्य है की जिस क्था को कबीर मंसूर या सुखसागर मे महाभारत से जोडकर बताया गया है वह मूल महाभारत मे है ही नही । इस कारण सुदर्शन का महाभारत से कोई संबंध साबित नही होता है।
इतिहास में क्या कहीं सुदर्शन ऋषि का विवरण मिलता है? नागपुर विश्वविद्यालय के पाली भाषा के अध्यक्ष डॉ विमल किर्ती बताते है कि बौद्ध काल में सुदर्शन नाम के एक बौद्ध भिक्षु का जिक्र मिलता है। वे आगे कहते है चूकि सारे दलित पूर्व में बौध्द ही थे इसलिए ऐसा हो सकता है सुदर्शन ऋषि कोई और नही वही बौद्ध भिक्षु ही रहे होगे।
कौन-कौन सी जातियां सुदर्शन समाज से जुडी है? डोमार के वे लोग जो सुदर्शन के समर्थक है, ये दावा करते है कि डोम-डुमार, हेला, मखिया, धनकर, बसोर, धानुक, नगाडची आदि सभी सुदर्शन को मानते है। लेकिन ये एक झूठ है, सच्चाई ये है कि केवल डोमार(डुमार) या अन्य जाति के वे परिवार जिन्होने इनसे वैवाहिक संबंध बनाये है सुदर्शन को मानते है। यहां ये भी बताना जरूरी है की ऐसे लोग जो पढ लिख गये और सुदर्शन की सच्चाई से वाकिफ हो गये वे सुदर्शन को मानना बंद कर दिये। क्योंकि सुदर्शन आज डुमार समाज की गुलामी का प्रतीक है। यह एक ऐसा थोपा हुआ कलंक है जिसने इस जाति को हिन्दू धर्म का गुलाम बनाकर दलित आंदोलन से दूर कर दिया। इस कलंक को जितना जल्दी हो मिटा दिया जाय उतना अच्छा है।
सुदर्शन ऋषि से जुडने के कारण होने वाली हान‍ि
० अम्बेडकर के दलित आंदोलन से दूरी- पूरे देश में दलित आंदोलन चला जो ब्राम्हणवाद के विरोध में खडा हुआ। जिसमें जाटव, चमार, महार, रविदास आदि जाति शामिल हुई और तरक्की कर गई। जो दलित जातियां गुरू, ऋष‍ि के चक्कर में रही वे पिछडती गई। सांमंतवादी, ब्राम्हणवादी ताक़तें ये चाहती है की वे अंबेडकर से दूर रहे और गंदे पेशे को ना छोड़े ताकि उनके सुख में कोई खलल न हो।
० अपने गौरवशाली इतिहास को भूला दिया गया अम्बेडकरवाद जहां एक ओर अपने इतिहास को जानने के लिए प्रेरित करता है। आपने उदृधारक और शोषण कर्ता के बीच फर्क करना सिखाता है। वहीं सुदर्शन जैसे गुरूओं के साथ आने के कारण ये इतिहास ब्राम्हणवादी आडंबरो अंधविश्वासों में खो गया। अपने गौरवशाली इतिहास को अपने हाथों मिटा दिया।
० अपनी अवैदिक संस्कृति को मिटा जा रहा है- दलितों की महिला प्रधान, गैरब्राम्हणी, अवैदिक संस्कृति को मिटाया गया। डोमार समाज में कभी किसी अवसर या संस्कार में ब्राह्मण को नही बुलाया जाता था। क्योकि इनकी अपनी अवैदिक संस्कृति थी। इनकी अपनी पूजा की शैली, भजन गायन पध्दती थी, छिटकी बुदकी थी जिसे सुदर्शन के नाम पर हिन्दुकरण होने के कारण आज पूरी तरह मिटा दिया गया।
० केवल हिन्दू जज मान बनकर रह गये- आज डोमार लोग केवल हिन्दू समाज के जज मान बन कर रह गये। वे अनुसूचित जाति में आते है और डाँ अंबेडकर के प्रयास से दलित होने का लाभ जैसे आरक्षण, छात्रवृत्ति, नौकरी, व्यवसाय, ऐट्रोसिटी, सबसीडी का फायदा तो जमकर उठाते है। लेकिन जब चढ़ावा देने की बारी आती है तो वे वैष्णो देवी या किसी गुरू के द्वार जाते है। डाँ अम्बेडकर को मानने में आज भी संकोच करते है।
० पुश्तैनी भंगी व्यवसाय से छुटकारा नही मिल पाया-भारत की लगभग दलित जातियां जो अंबेडकर आंदोलन से जुड़ीं उन्होने संघर्ष करके अपना पुश्तैनी गंदे पेशे से छुटकारा पा लिया। लेकिन जो जातियां हिन्दू धर्म की गुरू या ऋषि की ओर गई वे गंदे पेशे में सुधार तो चाहती है लेकिन छोड़ना नही चाहती। डोमार जाति के नेता सफाई में सुविधा, पैसा की मांग तो करते है लेकिन पेशे को छोड़ने की मांग नही करते ।
० गुमराह करने वाले समाजिक नेता कुकुरमुत्ते की तरह पैदा हो गये- चूकि अम्बेडकरी आंदोलन सच्चे और झूठ में फर्क करना सिखाता है इसलिए आप अपने मार्ग दर्शक खुद बन जाते है। और आपको किसी नेता की जरूरत नही पडती। लेकिन सुदर्शन समाज में ऐसे नेताओं की कमी नही है जो आपको सुदर्शन के नाम पर गुमराह करने में कोई कसर नही रखेगे। वे चाहेंगे आप अपने गंदे पेशे को करते रहे और सुदर्शन का भजन गाते रहे ताकि उनकी राजनीतिक रोटियाँ सिकती रहे।

डाँ अंबेडकर की ओर एक कदम- पहले इस समाज के लोग सुदर्शन के साथ अंबेडकर का फोटो लगाते थे। लेकिन अब वे सुदर्शन के फोटो को हटा रहे हे। दलित मुव्हमेन्ट ऐसोसियेशन रायपुर, अंबेडकर विकास समिति जबलपुर, समाजिक विकास केन्द्र नागपुर इसके ज्वलंत उदाहरण है। डुमार समाज के सबसे बडे मार्ग दर्शक थे नागपुर के स्व राम रतन जानोरकर जो आरपीआई से नागपूर के महापौर बने थे। वे डाँ अम्बेडकर से बहुत करीब से जुडे थे। उन्हे महाराष्ट्र सरकार की ओर से दलित मित्र की उपाधि से नवाजा था। वे डाँ अंबेडकर के बौद्ध दीक्षा कार्यक्रम के संयोजक थे और उन्होने उनसे बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। डोमार समाज सहीत अन्य दलित समुदाय भी उनके मार्ग पर चलने को तत्पर है। स्व राम रतन जानोरकर इस समाज के सच्चे मार्ग दर्शक है। इस प्रकार और भी लेखक चिंतक समाजिक कार्यकर्ता है जो अंबेडकर आंदोलन से इन्हे जोड़ने की कोशिश कर रहे है।
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