शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

अंधविश्‍वास के खिलाफ जंग

अंधविश्‍वास के खिलाफ जंग
संजीव खुदशाह
देश के जाने माने वैज्ञानिक डॉ नरेन्‍द्र नायक के द्वारा विगत दिनों रायपुर में प्रस्‍तुत अंधविश्‍वास और चमत्‍कार पर दिया गया उनका आडियों विडियों व्‍याख्‍यान बेहद सराहनीय रहा। सराहनीय इसलिए भी रहा क्‍योकि जहां आज के दौर में पढे लिखे डाक्‍टर इंजिनीयर अंधविश्‍वास को मान रहेउसका आस्‍था के नाम पर बचाव भी कर रहेऐसे माहौल में अंधविश्‍वास के विरूध्‍द अलख जगाए रखना वास्‍तव में एक साहस का काम है।
दरअसल डॉ नरेन्‍द्र नायक अंधविश्‍वास शब्‍द को सही नही मानते है। वे कहते है कि अंधविश्‍वास शब्‍द वास्‍तव में अंधे लोगों का अपमान है। जो हमें नही करनी चाहिए क्‍योकि जिसे हम अंध विश्‍वास कहते है वह आँखों देखा गलत विश्‍वास है। वे अंधविश्‍वास के स्‍थान पर गलत विश्‍वास शब्‍द का प्रयोग करना ज्‍यादा ठीक समझते है।
वे कहते हे संसार में कोई भी चीज चमत्‍कार नही है। हर चमत्‍कार के पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण है। हमारी अज्ञानता ही चमत्‍कार हैजब इन  चमत्‍कारों का कारण एक साधारण व्‍यक्ति जान जाता है तो वह विज्ञान कहलाता है और जब ये कारण किसी ठग की जानकारी में आता है तो वह अंधविश्‍वास बन जाता है।
दरअसल भारत में बहुत बडा वर्ग अंधविश्‍वास का पोषण करना चाहता है। इसके पीछे उनकी राजनीतिकधार्मिकआर्थिक हित छिपे है। अंधविश्‍वास को फलने फूलने के लिए धर्म सबसे आसान खाद युक्‍त ज़मीन होती है। अगर ऐसा नही होता तो धर्म के प्रसार के नाम पर नर संहार नही हुये होते।
दरअसल आज आस्‍था और अंधविश्‍वास की महीन किन्‍तु स्‍पष्‍ट लकीर को मिटा दिया गया है। आज जब मंगल यान छोड़े जाने के दौरान इसरो प्रमुख द्वारा तिरूपती जाकर मंगल शांति की पूजा की जाती है तो पूरा संसार हमारी ओर कौतूहल की निगाह से देखता है। यह यकीन करना मुश्किल है की किस प्रकार देश के तथाकथित क्रीम वर्ग (बुद्धजीवि वर्गका अंधविश्‍वास के गर्त में डूब जाना, सिर्फ डूब ना नही बल्कि उस अंध विश्‍वास को अपनाने में गर्व भी करना सबसे बडा हास्‍यास्‍पद है।
वे कहते है आज देश में तीक्ष्‍ण बुध्‍दी के केन्‍द्र माने जाने वाले सारे संस्‍थान अंधविश्‍वास के केन्‍द्र बन चुके है। परिक्षाओं में पास होने के लिए मंदिर मस्जिद मजारों गुरूद्वारों में यहां के छात्र चढावा चढाने में आगे होते है। ये सारे संस्‍थान अंधविश्‍वास की गीरफ्त में आ चुके है चाहे IIT कानपूर रूरकी या खरगपुर हो या IIM हो या ISSRO हो चाहे IMA हो। किसी भी संस्‍थानों के छात्रों प्रोफेसरों द्वारा इन अंधविश्‍वास के खिलाफ आवाज नही उठाये गये। आखिर क्‍योंइसका कारण है बचपनहमारे यहां बच्‍चों को प्रश्‍न करने नही दिया जाता । जब बच्‍चा पहली  बार प्रश्‍न उठाता है तो हम उसे जलील करते है। इतनी हद तक जलील करते है की उसकी भविष्‍य में प्रश्‍न  पूछने की संभावनाएं खत्‍म हो जाती है। यदि बच्‍चा धर्म पर प्रश्‍न करता है तो हम बौखला जाते है। तय है हम उपहार स्‍वरूप अपने बच्‍चो को अंधविशास ही देते है।  जब वही व्‍यक्ति वैज्ञानिक बनता है तब भी अंधविश्‍वास की जकड से निकल नही पाता।
अंधविश्‍वास पर ठग करने वाले हमेशा इन्‍ही अंधविश्‍वासी क्रीम लोगों का हवाला  देकर  आम पढे  लिखे  लोगों की जबान बंद कर देते है। अंधविश्‍वास के झण्‍डाबरदार के आतंक का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है की पिछले वर्ष अंधविश्‍वास निवारण के अग्रणी कार्यकर्ता श्री नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या उनके द्वारा कर दी जाती है। वह भी सिर्फ इस लिए क्‍योकि वे आम लोगों को अंधविश्‍वास से मुक्ति का मार्ग दिखा रहे थे।
वे बताते है कि किस प्रकार हिमालय की चमत्‍कारी जडीबुटियों के नाम पर टीवी विज्ञापन के द्वारा जनता में अधंविश्‍वास फैला कर उनकी गाढ़ी मेहनत की कमाई को लूटा जाता है। लेकिन धर्म के नाम पर मठाधीश समर्थन में तो सरकार मौन खडी नजर आती है। उसी प्रकार जर्मनी के टेक्‍नोलाजी का प्रयोग करके पेंडेन्‍ट बनाया जाता जिसे चमत्‍कारी अल्‍लाह ताबीज या हनुमान चालीसा यंत्र लाकेट के नाम पर बेचा जाता है।  आज अंधविश्‍वास और विज्ञान की लडाई चरम पर है और जीत अंत में विज्ञान की ही होगी। 
ज्‍योतिषवास्‍तु आदि के साथ विज्ञान शब्‍द जोड देने से ये सब विज्ञान सम्‍मत नही हो जाता है। ठग आम जनता को ठगने के सारे हथकण्‍डे अपनाते है। वो  कभी धर्म का आड लेता है तो कभी विज्ञान की गलत व्‍याख्‍या का। धर्म की कट्टरता को बढावा देकर अपने अंधविश्‍वास को वैज्ञानिकता का जामा पहनाना  कोई नई बात नही है। और रोडे अटकाने वालों का नर संहार वे ही धर्म करते है जो अपने आपको असहिसुष्‍णता का दावा करते नही थकते। ईसाई धर्म में गैलिलियोंकापरसनिकसब्रुनी जैसे वैज्ञानिक की हत्‍या सिर्फ इसलिए की गई क्‍योकि उनके निष्‍कर्ष धर्म के विपरीत थे। 11वी से 14वी शताब्‍दी के बीच ईसाई धर्म के प्रचार हेतु विरोधियों की हत्‍या करना किसी से छिपा नही है। मुस्लिम कट्टर वादियों के द्वारा किये जाने वाले नर संहार इसी  धार्मिक विश्‍वास भेद खुल जाने  के डर से किया जा रहा है। इसी प्रकार का विश्‍वास आज भारत में भी कट्टर हिन्‍दूओं द्वारा किया जा रहा है वो भी बडी ही जोर शोर से। वे ईसाई कट्टर वादियोंमुस्लिम आतंकियों के नक्‍शे कदम में चलकर इन्‍ही अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति जहर उगलते है। चर्चो और मस्जिदों में हमलें इसी के परिणाम है। इसके उदाहरण आप सोशल मीडिया जैसे वाटस ऐपफेसबुक में आसानी से देख सकते है। ऐसे संदेशों को फारवर्ड या लाईक करने वाले मासूम लोग इन कट्टर वादियों के आसान शिकार और हथियार बन जाते है। क्‍योकि इन्‍हे पिक्‍चर का केवल एक ही पहलू दिखाया जाता है। यहां जिम्‍मेदारी उन लोगों की ज्‍यादा बनती है जो इन कट्टर वादियों के षडयंत्र को जानते है। उन्‍हे चाहिए की इसका अपोज करेसोशल मीडिया द्वारा लोगों को पिक्‍चर के दूसरे पहलू से अवगत कराये। तभी अंधविश्‍वास के खिलाफ लड़ाई को आगे बढाया जा सकता है।
जिस देश का शिक्षित वर्ग अंधविश्‍वास के गर्त में जा रहा हो उस देश के द्वारा विश्‍वगुरू बनने का दावा करना क्‍या अपने मूह मिया मिट्ठू बनने जैसा नही है? क्‍या भारत कभी इस गर्त से बारह निकल पायेगा?

सकारात्‍मक पहलू यह है कि अंधविश्‍वास निवारण पर केन्द्रित इस कार्यक्रम में बडे हाल का खचा खच भरा होना वो भी वर्कींग डे परइस बात का प्रमाण है की भारत का आम आदमी इन अंधविश्‍वास से मुक्ति चाहता है। अंधविश्‍वास को करीब से समझना चाहता है ताकी उसका खात्‍मा किया जा सके। खास तौर पर धन्‍यवाद के पात्र वे है जिन्‍होने जाने अंजाने अंधविश्‍वास को मिटाने की पहल की या पहल करने की आकांक्षा रखते है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

वेलेन्‍टाईन डे के विरोध का वास्‍तविक मकसद क्‍या है

प्रेम का संदेश देता संत वेलेन्‍टाईन दिवस
संजीव खुदशाह
सदियों से प्रेम और उसकी भावनाओं को धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों ने अपनी पैरो की जूती समझा है तथा प्रेम के दीवानों पर सैंकड़ो सितम ढाये है। बावजूद इसके प्रेम के नाम पर अपने आपको न्‍यौछावर कर देने वाले संत वेलेन्‍टाईन के बलिदान दिवस को पूरी दुनिया बडी सिदृत मोहब्‍बत का त्‍यौहार मनाती है। आज विश्व की युवा पीढी और हर वह व्यक्ति जो अपने जीवन साथी को प्यार करता हैअपने प्रेम के इजहार के लिए 14 फरवरी के इस मुकदृदस दिन का बडी बेसब्री से इंतजार करता है।
वेलेन्टाइन डे क्यों मनाया जाता है इसके पीछे कई मान्यताएं है। सर्वस्वीकृत मत और तथ्य  ये है की रोम के दुष्‍ट दुराचारी सम्राट क्लॉ्डियस ने अपनी सैन्य शक्ति बढाने के उद्देश्य से अपनी प्रजा के बीच यह भ्रम फैला रखा था की पुरूषों को विवाह नही करना चाहिए इससे उनकी बुध्दि और शक्ति में कमी आती है। उसने इसके लिए बकायदा कानून बनाये और जनता के बीच कडाई से लागू कियासैनिक और राज्य के अधिकारियों को भी विवाह करने में पाबंदी लगाई गई। ऐसा कहा जाता है कि‍ संत वेलेन्टाईन सम्राट के इस कानून का विरोध करते और युवक युवतियों को मुहब्बत करने के लिए प्रेरित करते उनकी शादियाँ करवाते थे।  जब क्लोडिअस को इस बारे में पता चलाउसने वेलेंटाइन को गिरफ्तार करवाकर जेल में भेज दिया। जिस जेल में पादरी वेलेन्टाईन बंद थे वहां के जेलर की पुत्री का उन्होने उपचार किया था जिससे उन्हे  प्यार हो गया । रोम के सम्राट क्लॉ्डियस द्वारा संत वेलेन्टाईन की 14 फरवरी 269 इसवी को हत्या  करवा दी गई। मारे जाने से एक शाम पहलेउन्होंने पहला "वेलेंटाइन" स्वयं लिखाउस युवती के नाम जिसे वे बेहद प्यार करते थे। ये एक पत्र था जिसमें लिखा हुआ था "तुम्हारे वेलेंटाइन के द्वारा"।
ऐसी मान्यता है की प्रारंभ में रोम के निवासी इस दिन घरों में साफ सफाई किया करत थे और एक दूसरों को प्रेम का संदेश देते थे। यह संदेश हस्त लिखित होता था। बाद में यह दिवस प्रेम के आईकन के रूप में सर्व स्वीकृत होता गया। 1797 ईस्वी ब्रिटेन में पहले पहल छपे हुये संदेश भेजने की परंपरा शुरू हुई बाद में ग्रि‍टिंग (चित्रकारी के साथके रूप में प्रेम के संदेश को प्रेषित किया जाने लगा। वह हस्‍तलिखित पत्र आज इलेक्‍ट्रानिक कार्ड का रूप ले चुका है। बडी बडी कम्पनियाँ इस मौके पर तैयारी करती है और युवाओं को लुभाने का प्रयास करती है। अब होटलबाजारबाग बगीचे सजा ये जाते हैगिफ्ट आईटमों में छूट की पेशकश की जाती है। पूरा बाज़ार मानो सज धज कर तैयार हो जाता है।
विवाह दिवस के रूप में मनाया जाना:- वैसे प्रेम और प्रेम विवाह किसी मूहूर्त के मोहताज नही होते है। बहुत कम लोग जानते है कि इस दिन को विवाह दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वेलेन्‍टाईन दिवस के दिन विवाह किये जाने का क्रेज जोरों पर है प्रेमी जोडे विवाह करने हेतु इस दिवस को चुनते है। इसलिए इसे विवाह दिवस के रूप में भी जाना जाने लगा है। 14 फरवरी को ऐसी कई हाई प्रोफाईल शादियाँ सुर्खियों में रहती है जो कुण्‍डली मिलानविवाह मुहूर्त के बिना सात फेरे लेकर अपनी शादी को यादगार बनाना चाहते है।
वेलेन्‍टाईन को लेकर विवाद:- आज से 1700 सौ साल पहले जिस प्रकार नफरत का जहर फैलाने वाले कट्टरवादी और तानाशाही विचारधारा के लोग प्रेम के परवानो पर कहर ढाते थे। आज भी उस क्लॉ्डियस की संताने इन प्रेमियों पर जुल्‍म ढाने से बाज नही आजे है। लेकिन उनका तरिका बदल गया है। भारत में कुछ कट्टरपंथियों के द्वारा इस दिवस का विरोध किया जाता है। वे इस दिवस को मनाने से मना करने के कई हास्‍यास्‍पद तर्क देते है जैसे इस प्रेम (वेलेन्‍टाईनदिवस को मनाने से भारतीय संस्‍कृति नष्‍ट हो जायेगीयह विदेशी संस्‍कृति का हमला हैप्रेम करना गलत है आदि आदि। कुछ लोग इस दिवस का भारत में प्रभाव खत्‍म करने की गरज से बजुर्ग दिवस, हिन्‍दू संस्‍कृति विकृत दिवस, पूजन दिवसमातृ-पितृ दिवस मनाने तक की घोषणा करते है। वे अपने आप को भारतीय संस्‍कृति का ठेकेदार समझते है। उनकी नजर में भारतीय संस्‍कृति इतनी कमजोर है की वेलेन्‍टाईन दिवस मनाने से नष्‍ट हो जायेगी, न की और मजबूत होकर फलेगी फूलेगी।

वेलेन्‍टाईन डे के विरोध का वास्‍तविक मकसद क्‍या है यदि गौर से देखे तो जो कट्टरपंथी लोग इस दिवस का विरोध करते हैउनका संस्‍कृति और धर्म से कोई लेना देना नही है वे जानते है कि उन्‍हे लोगो का समर्थन नही है वे इस तथ्‍य से तिल मिला जाते है और किसी न किसी प्रकार से चर्चा में बने रहना चा‍हते हैशायद ये एक सबसे आसान रास्‍ता है मी‍डिया में बने रहने का। दूसरा मकसद यह है कि वह क्‍लोडियस की तरह जनता की आँखो में घूल झोक करनफरत और घृणा का बीज बो कर लंबे समय तक सत्‍ता में काबि‍ज रहना चाहते हो। लेकिन सुखद है कि भारत का युवा इन सब से दूर प्रेम के इस दिवस को बडे ही तहजीब से मनाता आ रहा है। सात समुन्‍दर पार से आये इस प्रेम के त्‍योहार को यहां के युवा ही नही बुजुर्ग भी बडे शान से मनाते है। भारत में जातिधर्मऊंच-नीच के भेद को मिटा कर वास्‍तव में वासुदेव कुटुम्‍बकम का आगाज करने की पहल की जा चुकी है। यही बात इन नफरत के झंण्‍डाबरदारों को खटकती है। बडी ही दुख की बात है जब हमारे देश की दीवाली अमेरिका के वाइट हाउस में मनाई जाती है  तो हम गौरांवित होते है और जब पश्चिमी देशेा का कोई त्‍योहार हमारे देश में मनाया जाता है तो हम हाय तौबा मचाते है। हमें इस दोगली नीति से बचना होगा। हमारे संविधान में लिखा है कि भारत एक स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ सबको अपनी तरह जीवन जीने अधिकार है। यह अधिकार छीनने का हक किसी को भी नही है स्‍वयं माता पिता को भी नही।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

बुधवार, 27 अगस्त 2014

जन समाज की भाषा से संस्कृत भाषा का जन्म हुआ।

पुस्तक समीक्षा

संस्कृत सबसे नई और कृत्रिम भाष्‍ाा है।

संजीव खुदशाह

भाषा की उत्पत्ति के विषय में अधिकांश प्राचीन जनों का यह विश्वास था कि यह ईश्वर कृत है। बाइबिल के अनुसार भाषा की उत्पत्ति आदम के साथ हुई। वह देवताओं की भाषा को समझते थे।
कुरान की एक आयत के अनुसार भी उसने आदम को नाम सिखाए, सारे के सारे नाम।मिश्री अपनी भाषा को देवताओं की सृष्टि मानते थे। सत्रह वी शताब्दी तक स्वीडन के एक भाषा शास्त्री का यह निश्चित मत था कि ईडन के बाग में ईश्वर, आदम और सांप क्रमश: स्विस, डेनिस और फ़्रेंच भाषा में बात करते थे। इसी प्रकार भारत में कुछ लोग संस्कृत को देव भाषा मानते है और वेद आदी संस्कृत ग्रंथ अपौरूषेय बताते है।
प्रस्तुत किताब आर्य द्रविड भाषाओं का अंत: संबंधमें इन सब मुद्दों पर विस्तार से ‍विमर्श किया गया है। इस किताब में लगभग 15 अध्याय है। अध्यायों का शीर्षक रोचक है। जैसे प्राच्य विद्या की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, भाषा की उत्पत्ति और विकास, संस्कृत धातुओं की पृष्ठभूमि, संस्कृत और द्रविड भाषाएं, आर्य द्रविड शब्द भंडार की जङे आदी।
इस किताब के आमुख में लेखक प्रकाशक के बारे में एक अजीब टिप्पणी करते है। जैसे की किसी मजबूरी में उन्हे यह किताब इस प्रकाशक से प्रकाशित करने हेतु बाध्य होना पङा।
मेरे अपने जीवन और मेरी कतिपय पुस्तको के साथ ऐसा ही रहा है। उसी का परिणाम है कि जहां इस पुस्तक का प्रकाशन एक अन्य प्रतिष्ठान से होना था, वहां इसे सस्ता साहित्य मंडल से प्रका‍शित कराने का निर्णय लेना पङा।
ग़ौरतलब है कि इस किताब का पहले 1973 में प्रकाशन हो चुका, यह इसका पुन: प्रकाशन है।
बहरहालप्राच्य विद्या की मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमिअध्याय शीर्षक में वे लिखते है प्राच्य भाषा विद्वानों ने संस्कृत सहित अन्य भाषाओं का जो अध्ययन, ग्रंथो के अनुवाद लिखे। उसका एक मात्र उद्देश्य था। हिन्दू धर्म का नाश करना ईसाई धर्म का प्रचार करना। लेखक का मानना है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य अँग्रेज़ अफ़सर इसी लक्ष्य से वेदो स्मृतियों का अनुवाद प्रकाशन में अहम भूमिका निभाते थे। वे मेक्समुलर जैसे विद्वान पर प्रश्न उठाते हुए लिखते है।
संस्कृत के अध्येता मैक्समूलर का जो गौरव पूर्ण स्थान है उसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नही। प्राच्यविद्या के क्षेत्र में शायद ही किसी अन्य विद्वान ने इतना बङा काम किया हो जितना इस जर्मन विद्वान ने। पर अपनी सीमाओं से वह भी उपर नही उठ सका था और उसकी यह सीमा भारतीय सामग्री को समझने के मार्ग में उसकी सबसे बडी बाधा थीदेखे पृष्ठ 50
वे आगे एक पत्र के हवाले से कहते है, 16 दिसंबर, 1868 को भारत सचिव ड्यूक आँफ आर्गाइल को पत्र में उन्होने लिखा था, “भारत का पुरातन धर्म रसातल को जाने वाला है और यदि ईसाइयत इसका स्थान लेने को अग्रसर नही होती तो इसमें किसकी गलती है।देखे पृष्ठ 51
यदि ऐसा सही भी था इसके बावजूद इन विदेशी विद्वानों के श्रम को कम करके नही आंका जा सकता क्योकि कई शासक आये लेकिन इस प्रकार की खोज किसी ने नही की। जबकि यह सर्वज्ञ है कि किस प्रकार भारत के संस्कृत साहित्य को छिपा कर रखा गया। उसे पढना तो दूर देखने तक का हक नही था। उसे देव भाषा ईश्वर कृत ग्रंथ कहा गया जो गैरब्राम्हणों के सिर्फ देखने या सुनने से ही अपवित्र हो जाता था।
मैक्यमूलर सहित अन्य पाश्चात्य विद्वानों ने न सिर्फ इन किताबों को पढा बल्कि इसका अनुवाद अंग्रेजी में किया तथा दुनिया को ये बतला दिया की इसमें रहस्य जैसा कुछ नही है। आज ये किताबें अंग्रेज़ी से अनूदित होकर हिन्दी में उपलब्ध है। हमें तो इन पाश्चात्य विद्वानों का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने कई अपठ्य प्राचीन भाषाओं को पढा और उसका मतलब बताया। जिन शिलालेखों पर ग्वाले बैठा करते थे या जो सिर्फ पूजा करने के काम आती थी। उन्होने इनके ऐतिहासिक महत्व को बताया।
सकारात्मक तथ्य यह है कि भगवान सिंह संस्कृत सहित अन्य भाषाओं को देवताओं से उत्पन्न भाषा नही मानते। किंतु आर्य और द्रविड़ भाषाओं को एक ही कुल की भाषा मानते है। आर्य और द्रविड भाषाएं परस्पर भिन्न कुलों की भाषाएं नही है अपितु वे एक ही भाषाई पर्यावरण से निकली है निश्चय ही उनका संबंध प्राचीन अवस्थाओं पर जाकर जुडता है न कि ऊपरी स्तर परदेखे अध्याय शीर्षक भाषा की उत्पत्ती और विकासपृष्ठ 103
वे वैदिक एवं संस्कृत दोनो को ही कृत्रिम भाषाएं मानते है । वे प्राकृत के बारे में कहते है प्राकृत नाम से इतना तो स्पष्ट है कि यह नाम संस्कृत के विकास के बाद पडा था और इसका लक्ष्य संस्कृत का जन बोलियों से भेद प्रकट करना था। प्रकृत या प्रकृति शब्द से इस शब्द की व्युत्पत्ति यह प्रकट करती है कि यह सामान्य या अशिक्षित जन समाज की भाषा थी, जबकि संस्कृत विशिष्ट वर्ग की, विशिष्ट प्रयोजन से निर्मित भाषा।देखे पृष्ट 131
इसी तारतम्य में वे डा चाटुर्ज्या के हवाले से लिखते है कि प्राकृत भाषाओं से ही कृत्रिम भाषाएं वैदिक एवं संस्कृत का विकास हुआ। इस अध्याय वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियाँमें वे यह नई स्थापना देते है। जो महत्वपूर्ण है।
1-         संस्कृत अलौकिक या देव भाषा नही है।
2-         संस्कृत और वैदिक भाषाएं कृत्रिम भाषा है। इनका कभी भी आम बोलचाल में प्रयोग नही हुआ।
3-         उक्त दोनो भाषाओं का विकास प्राकृत से हुआ।
4-        प्राकृत जो आम जन समाज की भाषा थी, का नामाकरण संस्कृत के विकास के बाद हुआ।
5-         द्रविड भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है।
उनकी इस स्थापना से यह बात सिद्ध होती है कि संस्कृत आर्यों की भाषा नही है क्योंकि इसका विकास प्राकृत से हुआ है प्राकृत जन मानस की भाषा थी। आर्यों की नही।
द्रविड भाषा के बारे में लेखक भगवान सिंह द्रविड भाषा के विद्वान काल्डवेल के हवाले से लिखते है कि द्रविड भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है। काल्डवेल की अनेक स्थापनाओं में संशोधन हुआ है, परंतु द्रविड भाषा के पृथक परिवार की अवधारणा और तथ्य कि इसकी उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है, अकाट्य मानी जाती है। यह सच है कि द्रविड भाषाओं की जननी संस्कृत नही है, परंतु उतना ही सच यह भी है कि उत्तर भारत की आधुनिक बोलियों की जननी भी संस्कृत नही है।अध्याय शीर्षक संस्कृत और द्रविड भाषाएंदेखे पृष्ठ 155
यह एक बेहतरीन किताब है। शोधात्मक भाषा शैली में लिखी यह किताब आम पाठक के लिए भी रोचक है। लेखक ने प्राकृत संस्कृत से लेकर द्रविड़ भाषा के अंत:संबंध को बडी गहराई और शिद्दत से प्रस्तुत किया है। आशा करता हूँ भाषा विज्ञान से सरोकार करने वालो के लिए यह एक बहुमूल्य किताब सिद्ध होगी।
किताब  का नाम - आर्य द्रविड भाषाओं का अंत: संबंध (2013)
लेखक          - भगवान सिंह
पृष्ठ             -275  ISBN -978-81-7309-674-7(PB)
मूल्य           -160 रू
प्रकाश्‍ाक         - सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन

एन - 77, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली 110001
प्रसिध्द पत्रिका युध्दरत आम आदमी के जुलाई 2014 में प्रकाशित

मंगलवार, 27 मई 2014

गर्म लावे

मै जानता हूं,
अगर मै कुछ कहता
ये मेरी जीभ काट ली जाती।
मै जानता हूं,
अगर मै कुछ सुनता
मेरे कानों में गर्म लावे ठूंस दिये जाते।
जिसे बताते थे तुम अपना, रहस्य खजाने का 
जिस पर तुम आध्यात्म के नाम पर इठलाते थे इतना
मैने आज इनको पढ़ लिया है।
जान लिया है वो कारण,
जीभ को काटने का
कानो में गर्म लावे ठूसने का
मेरे ही पूर्वजों का पौरूष दफ्न है।
तुम्हारी इन पोथियों में, जिन्हे तुमने दानव राक्षस पुकारा था

संजीव खुदशाह

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

पटवारी का इतिहास


  •    संजीव खुदशाह
आज पटवारी भारत के जन मानस का एक महत्वपूर्ण अंग है। कोई भी गांव की कहानी पटवारी के जिक्र के बिना पूरी नही होती। लोक गीत लोक-कथाओं में इसकी मौजूदगी गहरे पैठ को दर्शाती है। पहले पटवारियों के पास दो कोड़ेदार, ग्राम कोतवाल और घोड़े हुआ करते थे।
भारत के ज्ञात इतिहास में सर्वप्रथम भूमि को नाप कर उसका हिसाब किताब रखने का कार्य

बादशाह शेर शाह सूरी ने 1537 मे किया था इसी ने ज़मीन मामले की देखरेख हेतु पटवारी पद की स्थापना की। इस हेतु बादशाह का मुख्य उद्देश्य भूमि पर लगान वसूली एवं बकाया का इसाब रखना था, जिसके लिए भूमि का हिसाब रखना जरूरी था। इसलिए पटवारी, शासन एवं निज़ी भूमि यों के कागज़ात का संधारण करता था साथ ही लगान वसूली करता था। शेर शाह सूरी के बाद मुग़लों ने भी इस भू प्रबंध को जारी रखा। अकबर के नवरत्नो में से एक टोडरमल खत्री ने इसे और सुढ़ड किया। इस समय देश के कौन से खेत में कौन सा फसल बोया गया है और किस भूमि का कितना लगान है इन सबका वर्षवार लेखा जोखा रखा जाता था। जिसे जिन्सवार कहते है। जब भारत में अंग्रेज़ों का शासन था तो उन्हे लाल किले से कई ट्रक कागज़ात मिले उसे डिस्पोज करते समय जांच में पाया गया कि करीब दो से तीन सौ साल तक के जिन्सवार भरे पड़ें थे। वे चकित थे और इन कागजातो को सहेज कर रखा। उल्लेखनीय है कि आज भी राजस्व विभाग द्वारा जिन्सवार उसी तरह बनाया जाता है। जिनके आधार पर फसल का पूर्वानुमान और राष्ट्रीय नीति तैयार होती है। यहां यह भी बताया जाना जरूरी प्रतीत होता है कि राजस्व विभाग में प्रयुक्त शब्दावली हूबहू उसी काल की प्रयोग कि जाती है जैसे- पटवारी, तहसीलदार, नाईब तहसीलदार, कानूनगो, वासील वाकी नवीस, जमादार, हल्का, खसरा, खतौनी, चिटठा, तितम्मा आदी।
पटवारी या उससे मिलती जुलती प्रणाली पूरे विश्व में अपनाई जाती है। किंतु पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल सहित कुछ देशों में पटवारी शब्द आज भी प्रचलित है। वही भारत कुछ हिस्से में पटवारी को अन्य नामो से भी पुकारा जाता है। जैसे गुजरात महाराष्ट्र में कुलकर्णी अब तलाठी, तमिलनाडु में पटवारी अब कर्णम अधिकारी, पंजाब में पटवारी कोपिंड दी मांगांव की मा भी कहा जाता है,आंध्रप्रदेश में अब पटवारी को आर... यानी ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी कहा जाता है, वही राजस्थान में पहले पटवारियों को हाकिम साबहु कहा जाता था। उत्तर प्रदेश में पटवारियों की हड़ताल से खफा होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह ने यह पद ही समाप्त कर दिया। लेकिन बाद में उन्हे लेख पाल के नाम से पुनः बहाल करना पड़ा। उत्तराखण्ड में पटवारी को पुलिस के भी अधिकार प्राप्त है। उन्हे राजस्व पुलिस कहा जाता है। राज्य के 65 फीसदी हिस्से में अपराध नियंत्रण, राजस्व संबंधी कार्यो के साथ ही वन संपदा की हकदारी का काम पटवारी ही सभांल रहे है।
पटवारियों के बारे में कोई केन्द्रीय कृत आंकड़ा नही है। राजस्थान में 10,685 पटवारी है तो मध्यप्रदेश में 11,622 छत्तीसगढ़ में लगभग 3200 वही उत्तर प्रदेश में 27,333 है। छत्तीसगढ़ का भूमि अभिलेख इंटरनेट पर मौजूद है तथा पटवारियों को 10 वर्ष पहले कम्प्यूटर दिये गये थे। लेकिन नई हल्का बंदी होने के कारण पटवारियों की संख्या काफी बढी है, जिन्हे कम्प्युटर प्रदाय किया जाना है।
भूअभिलेख संहिता के अनुसार एक पटवारी को एक निश्चित खाते का एक हल्का दिया जाना चाहिए। ग्रामीण इलाके में नई हल्का बंदी होने के कारण स्थिति ठीक हो गई, लेकिन शहरी इलाके में हल्का बंदी नही होने के कारण स्थिति विकट है। यहां हजारों खाते में एक पटवारी नियुक्त है इस कारण कार्य का बोझ और त्रूटी की संभावनाएं बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ मे ये शहरी इलाके आज भी नई हल्का बंदी का इंतजार कर रहे है।
ये सुखद है 475 वर्ष पुराना पटवारी हमेशा अपने आपको नई तकनीक एवं व्यवस्था के अनुरूप अपडेट किया है। लेकिन भारत की भू प्रबंधन प्रणाली कई मायने में पीछे चल रही है। उसे विकसित देशों के अनुरूप बंदोबस्त को अधतन करना होगा।
Publish on Nov Bharat 23/02/2014