रविवार, 12 नवंबर 2017

Is Ravana Really a symbol of evil?


रावण यदि दलित या ओबीसी होते तो दशहरा मातम में बदल जाता?
संजीव खुदशाह
मुझे इस पर लिखने का ख्‍याल तब आया, जब कॉलोनी के एक WhatsApp ग्रुप पर ब्राह्मण मित्र ने मैसेज भेजा उसका मजमून कुछ इस तरह था की रावण ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता था। बावजूद इसके उसे प्रति वर्ष बुराई का प्रतीक कहकर जलाया जाता है। यह ब्राम्‍हण के साथ शोषण जैसा है। यदि यही रावण किसी दलित या ओबीसी जाति का होता, तो लोग उसके विरोध में खड़े हो जाते। और रावण को जलाने का उत्सव मातम में बदल जाता हम यदि वाल्‍मीकि रामायण की माने तो रावण सारस्‍वत ब्राम्‍हण पुलस्‍त्‍य ऋषि के पौत्र एवं विश्रवा ऋषि के पुत्र थे।
मैं आज इस पर बात करना चाहता हूं। इस बात पर नहीं कि रावण ऐतिहासिक है या नहीं । या सचमुच उसका जन्म नरक चौदस के दिन हुआ था या नही।  मैं इस पर भी बात नहीं करूंगा की रावण की जाति क्या रही होगी। मै इस विषय पर बात करूंगा कि रावण को क्यों जलाते हैं? उसका मकसद क्या है? और कौन लोग रावण को जलाते हैं?
आजकल बहुजन-अंबेडकर वादियों के बीच रावण को मूल निवासियों का राजा कहकर प्रचारित किया जा रहा है। दरअसल यह ब्राह्मण वादियों के समानांतर बेहद जातिवादी सिद्धांत है। जब आप किसी जातिवादी सिद्धांत को मानते हैं तो आप केवल जाति को ही मानते हैं। सिद्धांत आपके लिए कोई मायने नहीं रखता। बहुजन मूवमेंट में भी यही बातें जोरों से घर कर रही हैं। कई मिथको को अपनाया जा रहा है उन्‍हे नये शिरे से गढा जा रहा है। इसके पहले महिषासुर पर भी बहुजन आंदोलन जोरों पर था। कुछ लोग जो इन बातों को थोड़ा बहुत समझते रहे हैं वह आरोप संघ के माथे पर मढ़ कर कान में रूई डालकर सो जाते।
अब मैं उस WhatsApp पोस्ट की तरफ पुनः जाना चाहूंगा जो एक ब्राम्हण मित्र ने ग्रुप में भेजी थी। दरअसल उस पोस्ट ने मुझे हद तक परेशान कर दिया। और यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया की ब्राम्हण कुमार रावण को आखिर जलाया क्यों जाता है। मैंने अपने अपने स्तर पर इसकी तहकीकात की। ऐतिहासिक स्तर पर जांच पड़ताल की। तो मुझे यह बात छनकर सामने आती हुई नजर आई की दरअसल यह लड़ाई किसी जाति के विरोध के बजाय सच के साथ झूठ की है। और यह लड़ाई आज भी चल रही है। मैं अगर संकुचित शब्दों में कहूं तो ब्राह्मणवाद की लड़ाई यथार्थवाद से चल रही है। यहां पर आप ब्राह्मणवाद को सीधे किसी जाति से जोड़ कर ना देखें। अगर आप ऐसे दृष्टिकोण से देखेंगे तो आप भ्रमित हो जाएंगे और सच्चाई का पता लगाने में मुश्किल आएगी।
दशहरे के समय तमाम ब्राम्हणवादी मीडिया, ब्राह्मणवादी लोग रावण को बुराई एवं अहंकार का प्रतीक कहकर और राम को सच्चाई का प्रतीक कहकर प्रचारित करते हैं। और रावण की हत्या को जायज ठहराते हैं। मैं काफी समय पहले से यह कहता आया हूं कि ब्राह्मणवादी लोग जातिवादी नहीं होते हैं। जातिवादी होते हैं गैर ब्राह्मणवादी लोग। ब्राह्मणवादी लोग केवल ब्राम्‍हण एवं ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मानते हैं। ब्राम्हण जाति को नहीं। यदि एक शूद्र, ब्राह्मणों की उच्चता, एवं उनके अंधविश्वास को स्‍वीकारता है, तो वह उसे सिर आंखों का पर बैठाते हैं। लेकिन एक बहुजन वादी लोग एक ब्राह्मण की प्रगतिशीलता को देखते हैं। तो उसको शंका की निगाह से देखते हैं उसे तिरस्कृत करते हैं। वही दूसरी ओर एक ब्राम्हण वादी व्यक्ति अपने विचारधारा पर इतना अडीग होता है की यदि स्वयं ब्राम्हण भी उसका विरोध करेगा तो उसे, उस का सर कलम करने में तनिक भी देरी नहीं लगाएगा। अब मैं आपको बताना चाहूंगा की राम जाति से क्षत्रिय था। लेकिन ब्राम्‍हण की उच्‍चता को स्‍वीकारता था। इसीलिए ब्राह्मणों ने उसे सिर आंखों पर बिठाया और नायक बना दिया। वही रावण वंश के हिसाब से ब्राह्मण था। लेकिन यथार्थवादी था। ब्राह्मणवाद का विरोधी था। तो उन्हीं ब्राम्हणों ने उसकी हत्या करवाई और उसे राक्षस घोषित कर दिया। यही नहीं प्रतिवर्ष उस ब्राम्हण व्यक्ति रावण के पुतले को जलाया जाता है। इतना धृणित व्‍यवहार तो ब्राम्‍हणो ने एक शूद्र से भी नही किया। मौत, दर साल मौत की सजा।
यह मामला यहीं तक नहीं रुकता या और आगे बढ़ता है। ब्राह्मणवाद के विरोधी जितने भी लोग रहे हैं। उन्हें खत्म किया जाता रहा है। चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों ना रहे हो। विगत कुछ सालों पहले चाहे वह नरेंद्र दाभोलकर की हत्‍या हुई वे ब्राम्हण जाति से ताल्‍लुख रखते थे। उसी प्रकार कलबुर्गी एवं गौरी लंकेश लिंगायत ब्राम्‍हण समप्रदाय से आते थे। बावजूद इसके ब्राह्मणवादियों ने इन्हें बर्दाश्त नहीं किया और इन तीनों प्रगतिशील तर्कशील विद्वानों को जान से हाथ धोना पड़ा। उसी प्रकार नरेन्‍द्र नायक प्रसिध्‍द तर्कशील विद्वान जो की चितपावन ब्राम्‍हण से ताल्‍लुख रखते है। उन्‍हे कट्टरवादियों द्वारा जान से मारने की धमकी दी गई है। इसी कड़ी में आप गांधी, कबीर, रयदास की हत्‍या को जोड़ सकते है।
रावण को प्रतिवर्ष जलाने का मकसद यह है की ब्राह्मणवाद यानी जाति से ब्राह्मण होना सर्वोपरि है यह दर्शाया जाए। साथ साथ शस्त्रधारी जाति क्षत्रिय, ब्राह्मणों की भक्‍त है। यह बात बार-बार सामने आए ताकि बाकी बनिया समेत शूद्र जातियां प्रश्‍न उठाएं और उसी तरह ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को मानते रहे। उन्हें कोई चुनौती ना दे सके। इसी कोशिश में प्रतिवर्ष प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यह ना सिर्फ पुतले का दहन है। बल्कि गैर ब्राह्मणवादी दुश्मनों को ललकार भी है। उनके भीतर भय पैदा करना भी है। ब्राह्मणवादी लोगों का मनोबल बढ़ाना भी है। और अंधविश्वास को स्थापित करना भी इसके पीछे एक महत्वपूर्ण मकसद है।

यहां पर, जैसा कि पिछले साल से एक परंपरा चालू हुई है। नरक चौदस के दिन रावण का जन्मदिन बहुजन और आंबेडकरी विचारधारा के लोगो मनाने की शुरूआत किया गया है। अगर वह यह सोच कर इस जन्म दिन को मनाने की शुरुआत कर रहे हैं की रावण असुर है, मूल निवासी है। तो मेरा ख्याल है कि यह एक धोखा होगा। बहुजन आंदोलन के साथ एक धोका होगा। यह धोका होगा स्वयं रावण के साथ। अगर हम यह जन्म दिन इस मकसद से मना रहे हैं की रावण एक यथार्त वादी एवं गैर ब्राह्मणवादी विचारधारा का व्यक्ति था, तो मैं यह समझता हूं की भविष्य में इसके पीछे कुछ सकारात्मक होने की गुंजाईश छुपी हुई है।

अगर बहुजन आंदोलन, अंबेडकरवादी आंदोलन अपने जातिवादी होने के दुर्गुण से निजात पा लें, तो इस संसार में ऐसी कोई ताकत नहीं है जो उन्हें रोक सकेगी। क्योंकि जिस प्रकार ब्राह्मणवादी होना किसी एक जाति की बपौती नहीं है। उसी प्रकार प्रगतिशील होना भी किसी खास जातियों का एकाधिकार नहीं है। इस बात को समझना होगा और जातिवाद से निकलकर सिद्धांतवाद की ओर जाना होगा। तब कहीं जाकर रावण की जयंती को मनाने का सही मकसद पूर्ण हो सकेगा।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

एक मौन सामाजिक क्रांति का वाहक व्हाट्सएप


आज कीपेड फोन मानो अजायबघर की शान बन गई है इस फोन की बिक्री लगभग बंद हो चुकी है बिक्री यदि जोरो में है, तो बस स्मार्टफोन कम से कम कीमत में भी अधिक से अधिक कीमत में भी, स्मार्ट फोन ने लोगों की जिंदगी को बहुत हद तक प्रभावित किया है खासतौर पर व्हाट्सएप ने. यदि किसी के पास स्मार्टफोन है लेकिन इसमें व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के एप नहीं है तो यह माना जाता है कि बंदर के हाथ में मोतियों की माला है या यूं कहें कि हम जैसे बहुत सारे लोगों ने कीपैड मोबाइल के खराब होने पर स्मार्टफोन सिर्फ इसी लिए खरीदा की व्हाट्सएप चलाना है.
आज यदि कोई पूछे भारत में क्या चल रहा है तो एक ही जवाब बनता है व्हाट्सएप चल रहा है. क्या राष्ट्रवादी, क्या प्रगतिशील, क्या देशवादी, भले ही पानी पी पी के विदेशी वस्तुओं का, ऐप का, बहिष्कार करने के लिए नारा लगाएंगे. लेकिन व्हाट्सएप से 1 घंटे भी दूर नहीं रह सकते. ये है ही ऐसी बला प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी में यदि यह मुहब्बत और तल्खी का कारण बना है, तो पड़ोसी पड़ोसन के करीब आने का भी कारण बना है 
भारत में सरकारी विभाग तो WhatsApp को इसे  एसे उपयोग करती है मानो उन्होंने इसे पेटेंट करा रखा है या कहे खरीद लिया है. बहुत सारे आदेश, सस्पेंशन आदेश, नियुक्ति आदेश, कार्यवाहियों के आदेश इसी में पारित होता है. कर्मचारियों की निगरानी इसी से की जा रही है कुछ मातहत तो इसीलिए स्मार्टफोन बेचकर पुराना की फोटो कीपैड फोन ले लिए क्योंकि व्हाट्सएप के सरकारी दुरुपयोग से बहुत हद तक परेशान थे. ऐसा प्राइवेट कंपनियां भी कर रही है लेकिन वह इसे क्रिएटिविटी के तौर पर इस्तेमाल कर रही है ना कि सरकारी विभाग की तरह शिकंजा कसने के लिए.
चुकी आज व्हाट्सएप पर कथा निकल चुकी है तो यह बताना जरुरी है कि भरत में व्हाट्सएप के ग्रुप कुल जमा दो भागों में विभक्त है इन दो विभागों पर चर्चा करने से पहले यह जानना जरूरी है कि ग्रुप क्या है? और इसके कितने प्रकार हो सकते हैं?
दरअसल व्हाट्सएप ग्रुप एक खास विषय की ओर इशारा करता है जिस पर ग्रुप के सदस्य आपस में सूचना और विचारों का आदान प्रदान करते हैं. वर्तमान में व्हाट्सएप ग्रुप में 256 सदस्य हो सकते हैं.
आइए अब जाने की व्हाट्सएप एक ग्रुप कितने प्रकार के हो सकते हैं व्हाट्सएप ग्रुप कुल 13 विभागों में बांटा जा सकता है
(पहला) सामाजिक जातिगत वर्ग गत पारिवारिक ग्रुप
(दूसरा) धार्मिक ग्रुप
(तीसरा) अंधविश्वास विरोधी, प्रगतिशील, तर्कशील ग्रुप
(चौथा) साहित्यिक ग्रुप
(पांचवा) समाचार ग्रुप
(छठवां) कर्मचारियों-अधिकारियों का गैर विभागीय ग्रुप
(सातवां कर्मचारियों-अधिकारियों का विभागीय ग्रुप
(आठवां) कालोनियों, मोहल्लों के ग्रुप
(नवा) सोसाइटियों के ग्रुप, संस्थाओं के संघों के ग्रुप
(दसवां) चुटकुला हंसी मजाक अश्लील ग्रुप
(ग्यारवा) स्टूडेंट के शैक्षणिक ग्रुप
(बारवा) राजनैतिक ग्रुप
(तेरवा) व्यवसायिक ग्रुप
इन सब प्रकार के ग्रुप में अब व्यक्ति की जिंदगी सिमट कर रह गई है, लेकिन इसमें महत्वपूर्ण बात यह है, कि यह सभी ग्रुप दो अलग-अलग विचार धाराओं को लेकर चल रहे हैं, यानी विचारधारा के हिसाब से यदि ग्रुप क्रमांक 3 को छोड़ दें तो बाकी ग्रुप दो भागों में बांटे जा सकते हैं इन दोनों विचारधाराओं को हम और बी का नाम दे सकते हैं


ग्रुप ए

ग्रुप बी

1
 पति-पत्नी के रिश्ते, महिलाओं को नीचा दिखाने वाले मैसेज डाले जाते है. 

महिला पत्नी को नीचा दिखाने वाले मैसेज नहीं भेजे भेजे जाते हैं या भेजे जाने पर बुरा माना जाता है या ऐसे ग्रुप में पाबंदी होती है.
2
वंचित वर्ग को मजाक उड़ाया जाता है.

वंचित वर्ग या अल्पसंख्यक वर्ग या पीड़ित वर्ग की कद्र की जाती है उनके प्रति सद्भावना होती है.
3
हर प्रकार की समस्या का मुद्दा उठाया जाता, उस पर गहन चर्चा होती और उसका कारण अंत में आरक्षण को बताया जाता है.
वंचितों को दिए गए बराबरी के अधिकार एवं सुविधाओं का विनम्रता से समर्थन किया जाता है.

4
धार्मिक उन्माद, शत्रुता, जाति कटुता बढ़ाने वाले मैसेज भेजे जाते है.

धार्मिक उन्माद आपसी शत्रुता बढ़ाने वाले संदेश नहीं भेजे जाते हैं, बल्कि आपस में समाजिक सौहाद्र बढ़ाने वाले मैसेज को तरजीह दी जाती है.

5
छद्म देशभक्ति के नाम पर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने वाले संदेशों की भरमार होती हैं.

देशभक्ति के साथ-साथ अपनी गलतियों, भूलों चूकों का भी सावधानीपूर्वक पुनरवलोकन करते हैं.

6
किसी खास वर्ग को ऊंचा या किसी खास वर्ग को नीचा दिखा कर अक्सर जलील करने वाले संदेश भेजे जाते हैं. खासकर दलितों पिछडो अल्पसंख्यक  (मुस्लिमों सिखों जैनियों के विरोध में).

सभी वर्ग को समान आदर नजर से देखा जाता है.

7
ऐसे ग्रुप अपने आप को प्रगतिशील बताते हैं लेकिन इसमें ऐसे सदस्यों की भरमार होती है जो लिंग भेद, रंग भेद,  धर्म भेद, ऊंच-नीच, छुआछूत जैसी असमानता का संस्कृति के नाम पर छद्म विज्ञान के नाम पर समर्थन किया जाता है.

ऐसे ग्रुप के सदस्य लिंगभेद, रंगभेद, धर्म भेद,  ऊंच-नीच, छुआछूत, अंधविश्वास आदि असमानता की संस्कृति के नाम पर समर्थन नहीं करते हैं, बल्कि उनको मिटाने की बात करते हैं


यदि आप व्हाट्सएप का प्रयोग करते हैं तो आप आसानी से इन दोनों प्रकार के ग्रुप के वैचारिक अंतर को पहचान सकते हैं व्हाट्सएप में व्यक्ति एवं भारत के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया यह एक और किसी व्यक्ति की छद्म प्रगतिशीलता की पोल खोली है. तो दूसरी ओर कट्टरवाद का मुंहतोड़ जवाब भी दिया है. इसे भारत में मौन सामाजिक क्रांति की तरह देखा जाना चाहिए. आज जब किसी व्यक्ति के पास किताब-लेख पढ़ने का समय नहीं है, वही व्हाट्सएप ग्रुप किताब पढ़ने जैसा ज्ञान देता है, हालांकि भ्रम ज्ञान बांटने वालों की भी कमी नहीं है. यहां जिस प्रकार प्रिंटेड पत्र पत्रिकाओं किताबों में भ्रमित ज्ञान मिलता है उसी प्रकार व्हाट्सएप में भी भ्रमित ज्ञान मिल सकता है. लेकिन इंटरनेट के दौर में झूठा या भ्रमित ज्ञान ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता. बावजूद इसके व्हाट्सएप कि इस सोशल क्रांति को सकारात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए. 
दैनिक देशबंधु में प्रकाशित धन्यवाद   संजीव खुदशाह

शुक्रवार, 26 मई 2017

अंधविश्वासी महिलाओं की गोद भरता बाबा

अंधविश्वासी  महिलाओं की गोद भरता बाबा
•        संजीव खुदशाह 
विगत दिनो लखनऊ के करीब बाराबंकी में एक संत बाबा परमांनंद उर्फ राम शंकर तिवारी उम्र लगभग 65 वर्ष सुर्खियों मे है। उन पर आरोप है की उसने महिलाओं की गोद भरने की आड़ में बलात्कार किया और उनकी सेक्स वीडियो बनाया। ये भेद न खुलता यदि उसका लेपटाप खराब न होता। कम्पयूटर इंजीनियर ने जब लैपटॉप सुधारने के दौरान उस वीडियो क्लिप को देखा तो हैरान रह गया। उसमे करिब 200 महिलओं के साथ सेक्स वीडियो थे। उसने कुछेक वीडियो को सोशल साईट पर अपलोड कर दिया। इसके बाद हल्ला  मचा और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। सोशल मीडिया मे तैर रहे इन तमाम वीडियो मे से कुछ वीडियो को देखने के बाद मन विचलित हो जाता है और मन सोचने के लिए मजबूर होता है कि हमारा जन समुदाय किस ओर जा रहा है। हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है?

गौरतलब है कि बाबा परमानंद संतान प्राप्ति सुख देने के लिए विख्यात है खास कर पुत्र प्राप्ति हेतु। दावा है कि वैदिक रीति से

तंत्रमंत्र की साधना करते है। कई केन्द्रीय और राज्य  के मंत्री  उनके मुरीद है। उनके आश्रम (अय्याशगाह) में लगी इन हस्तियो के साथ तस्वीर को देखने से उनके राजनीतिक और समाजिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन वीडियो को देखने से कही से भी ये नही लगता की यह कोई बलात्कार है, ऐसे ही एक वीडियो में एक युवती अपने अद्योवस्त्र उतारा रही है और बाबा परमानंद के अंत:वस्त्र उतारने में मदद कर रही है। बाबा लेटे हुये है युवती मुख मैथुन कर रही है। तत्पश्चात बाबा उसे बाकी वस्त्र  भी उतारने का इशारा करते है वह बिना संकोच शेष वस्त्र  भी उतार देती है। गौर तलब है की इसी दरमियान भजन गायन की ध्वनी सुनाई पड़ रही है। महसूस होता है की दूसरे कमरे मे काफी लोग भजन गा रहे है और बीच बीच मे देवी देवताओं, बाबा परमानंद की जय के नारे भी  लगा रहे है। इसी बीच बाबा युवती को अपने उपर आने का इशारा करते है उसके नाज़ुक अंगो को छेड़ते है बाद में बाबा युवती के उपर आ जाता है। करीब 24 मिनट के इस वीडियो में मैथुन पश्चात बाबा खड़ा हो जाता है युवती उसे उसके अंत:वस्त्र पहनने के लिए देती है और अपने अंत:वस्त्र पहनती है। बताना चाहूंगा की महिला के वस्त्र  पहनने के दौरान लेटा हुआ बाबा उसके नाजुक अंगो मे, सिर व चहरे पर लात फेर रहा है। मानो वह कोई पालतु जानवर हो। आश्रम का वह कमरा जहां यह स्केण्डल हो रहा है निहायत ही छोटा है देवी देवताओं की तस्वीर और धार्मिक किताबों से अटा पड़ा है। किताबों के बीच लगे सी सी टीवी कैमरे से ये सब सूट किया जा रहा था। यह सब विस्‍तार से बताने का मकसद यह है की वीडियो में कोई जोर जबरदस्‍ती नही है, जैसा की प्रचारित किया जा रहा है। 
अन्य  वीडियो मे भी इसी प्रकार की प्रक्रिया नजर आती है। महिला बदल जाती है कभी सलवार सूट मे तो कभी साड़ी मे। ये वीडियो इस लिए विचलित कर देने वाला है क्योकि बाबा परमानंद के साथ सेक्स  कर रही महिलाएं कोर्इ सेक्स वर्कर नही है, आम उच्‍च  मध्यम परिवार की है। बावजूद इसके वे इसका विरोध नही कर रही है इस लिहाज से बाबा आरोपी बिल्कुल भी नही क्योकि कानून, सहमती के साथ किये गये संबंध की इज़ाजत देता है। 
यह सब ऐसे देश मे हो रहा है जहां महिलाएं घर से बाहर अकेले नही  निकलती। कोई अगर घूर कर देख भी ले तो लोग मरने माने को उतारू हो जाते है। निश्चय ही बाबा के आश्रम में आने के लिए उस महिला ने अपनी मां, बहन, भाई, सास, ननद, पति, देवर, देवरानी, जेठानी का सहारा लिया होगा। यानि उस दौरान जब वो बाबा के साथ समागम कर रही होगी तब निहायत ही करीबी रिश्तेदार बगल के कमरे में बाबा परमानंद की जय के नारे लगा रहा होगा या भजन में लीन रहा होगा। 
यह तो तय है की ये घटना पहली नही है नही ये घटना आखरी है। क्योकि जबतक धर्म के लिए अंधभक्ति रहेगी। तब तक आशाराम, परमानंद, नित्या नंद जैसे लोग अपनी इच्छा तृप्ती करते रहेगे। गौर तलब है की ये समस्या किसी विशेष धर्म तक सीमित नही है धर्म के ठेकेदार किसी न किसी रूप से अपने भक्तो  का शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक शोषण करते रहते है। 
क्यो होता है ऐसा?
ऐसे समय जब पाश्चात्य विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है। एक ओर भारत मे ही 70 वर्ष की महिला को चिकित्सा  विज्ञान के सहारे संतान सुख प्राप्त होने के उदाहरण मौजूद है। वहीं दूसरी ओर एक मर्द को भी बच्चे जन्म  देने का मौका मिल चुका है। ऐसी स्थिति में भारत में आये दिन ऐसी खबरे आना दुखद है। भारत का जनमानस अंधविश्वास से उबर नही पा रहा है। प्रशासन को इस पर गहराई के विचार करना होगा। हमे यह सोचने पर महबूर होना होगा की हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है? क्या हम धार्मिक अंधविश्वास के तले आधुनिक शिक्षा को रौद रहे है? संत बाबा परमानंद से समागम करती ये महिलाएं खूबसूरत है संभ्रात परिवार की लगती है। निश्चिय ही वे पढ़ी लिखी होगी उनका परिवार भी शिक्षित होगा। तो फिर उस परिवार ने कैसे संतान प्राप्ती के लिए झाड़ फूक यज्ञ हेतु अपनी महिलाओं को सौप दिया। 
पहलू और भी है 

ऐसे देश पर जहां महिलाओं पर अत्यंत रोक टोक की जाती है उन्हे महिनो चाहर दिवारी मे कैद रखा जाता हे वही दूसरी ओर ऐसे आश्रमो में जाने की खुली छूट रहती है। भारत में आज भी संतान के लिए महिलाओं को जिम्मेदार माना जाता है, नि:संतान होने पर तरह तरह से जलील किया जाता है। यातनाएं दी जाती है। पारिवारिक, समाजिक तानो से उसका जीवन नर्क बना दिया जाता है। इन वीडियो को देखने से लगता है कि इन नरक भरी ज़िन्दगी से उबरने के लिए यदि किसी महिला को ये सब करना पड़ रहा हो, तो शायद इतना बुरा  नही है। जिना समझा जाता रहा है क्योकि ऐसा करने के लिए उसी के परिवार ने, समाज ने मजूबर किया है। 

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

Bloody political battle of aristocrats

Right from the Vedas and the Puranas to modern literature and films, Dalits and backwards are being demeaned. How long will the Dalitbahujans continue to face this humiliation without a murmur of protest
It is election  season and the policies of different political parties pertaining to Dalitbahujans are under the scanner. At this point in time, it would only be appropriate if we try to analyse the contents of Rajneeti (Politics), a 2010 film  which was directed by Prakash Jha. Jha himself harbours political ambitions and is in the fray from the Betiah Lok Sabha constituency in Bihar as a JDU candidate.
The film portrays the north Indian political scene and exposes the bloody war for domination between political clans. The film is important not only because it mirrors Indian politics but also because it reflects the realities of Indian society. But – and this is a big but – it comes with feudal overtones.
The story goes something like this: Bharati, the daughter of a political leader, swayed by Communist ideology, turns against her father and has an affair with a much older Communist worker Bhaskar Sanyal (Nasiruddin Shah). Later, she gives birth to a boy, who is thrown into the Ganga. She is married off to Chandra Pratap for political gains.
The Pratap family lives in the capital of an unspecified Hindi-speaking state. The members of the family are active in a political party called Rashtrtavadi. Bhanu Pratap, the head of the party, is trying hard to come to power. But he suddenly falls ill and a battle starts within the family to usurp his political legacy. Bhanu Pratap  hands over the reins of the party to his younger brother Chandra Pratap. However, his son, Virendra Pratap wants to assume the leadership of the party himself and opposes Chandra Pratap.
Enter Dalit-backward leader Suraj Kumar (Ajay Devgn), whose influence is growing by the day. The film superbly portrays how the Dalits and backwards have become aware of their rights and are ready to fight for them. It also shows how, in order to undermine the real leadership of the Dalits, the political establishment promotes its Dalit flunkeys.
The film is centered on two groups, which want to establish control over the party so as to come to power. In one group are Prithvi Pratap Singh (Arjun Rampal), Samar Pratap Singh (Ranbir Kapoor) and Brijlal (Nana Patekar). The other group comprises Virendra Pratap Singh (Manoj Bajpai) and Suraj Kumar.
Prithvi and Samar are expelled from the party on the charge of undertaking anti-party activities. Then, Prithvi Pratap, along with his supporters, forms a new party Janshakti. In the bloody battle between Prithvi and Dhirendra that follows, Samar’s foreigner wife and Prithvi are killed. Virendra Pratap and Suraj are behind the murders. The film quite realistically portrays how political clans  take advantage of a murder in their families by telling voters to avenge the murder with votes, and dream of coming to power. The country’s political history is witness to many such instances.
When Brijlal comes to know that the Dalit, Suraj Kumar, is, in fact, the illegitimate son of Bharati, he sends her to Suraj with the mission to persuade him to join the Samar Pratap camp by making an emotional appeal to him. But Suraj is unmoved. In the end, Samar kills his political rivals Virendra Pratap and Suraj. Brijlal tells him, “Till your enemy is alive, you will suffer reverses after reverses. So, it is better to eliminate your enemy.” Spilling blood  is the only way they know to counter their political rivals. The logic is chilling: the path to success lies over the dead bodies of your political enemies.
Here, the character of Suraj typifies the caste Hindu mindset. Suraj is intelligent, he is shrewd and he has a deep understanding of the game of politics. He is popular among the Dalits and backwards and has the potential to script a major political upheaval. But at the end, he is shown to be an illegitimate offspring of a caste Hindu. This is an old habit of the caste Hindus. The implied message is hard to miss. If a Dalit-backward person rises in life, the blood of caste Hindus must be coursing through his veins. This serves two purposes: It demeans and humiliates the entire Dalitbahujan community and it dents his popularity among the Dalitbahujans.
The only problem is the feudal mindset that seems to inform the film’s script. The film-maker could well have spared Suraj and his backward community the humiliation heaped on them. Right from the Vedas and the Puranas to modern literature and films, Dalits and backwards are being demeaned. How long will the Dalitbahujans continue to face this humiliation without a murmur of protest?
Film : Rajneeti, Duration : 167 minutes,
Director : Prakash Jha, Producer : UTV Motion Pictures
Sanjiv Khudshah is a well-known Dalit writer

Published in the April 2014 issue of the Forward Press magazine

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

तेज सिंह एक प्रखर आलोचक थे

तेज सिंह एक प्रखर आलोचक थे
संजीव खुदशाह
प्रसिध्‍द अम्‍बेडकरवादी पत्रिका अपेक्षाके सम्‍पादक के रूप में तेज सिंह की पहचान पूरे भारत मे थी और अभी भी है। एक सरल सादे कलेवर में निरंतर प्रकाशित होने वाली पत्रिका का सभी लेखकों पाठकों को बेसब्री से इंतजार रहता था। तेज सिंह इसके अपने लंबे सम्‍पादकीय के लिए भी जाने जाते थे। सम्‍पादकीय अक्‍सर समसामयीक होती थी।
तेज सिंह के हिन्‍दी दलित साहित्‍य में मै एक विशेष स्थान पर देखता हॅू। इसलिए क्‍योंकि वे एक न्‍याय पसंद बेबाक टिप्‍पणी कार थे, स्‍वस्‍थ आलोचक थे। जब छोटे मोटे मौकापरस्‍त साहित्‍यकार, किसी बडे साहित्‍यकारों के आभा मण्‍डल की गिरफ़्त में आकर अंध प्रशंसा में लिप्‍त रहते , ऐसे समय में तेज सिंह अकेले खड़े रहकर स्‍वस्‍थ आलोचक की भांती सही और गलत को डंके की चोट पर कहते थे।
अक्‍सर इस कारण वे स्‍वयं आलोचना के शिकार हो जाते, पत्रिका भी  आलोचना के केन्‍द्र में आ जाती क्‍योकि गैंगबाजी का शिकार बीच-बीच में साहित्‍यकार भी होते रहे है। मेरी तेज सिंह से दो तीन बार मुलाकात हुई जब भी मुलाकात हुई  हाल चाल और यहां वहां की बाते करते। अपने आपकों धीर गंभीर या हमेशा अम्‍बेडकर साहित्‍य चिंतन में खोये रहते बताने की कोशिश नही करते। अपनी पत्रिका की तरह सरल दिखाई पडते । वे बेशक आज हमारे बीच नही है लेकिन उनकी पत्रिका उनका साहित्‍य आज उनकी उपस्थिति का एहसास कराता है।
वे जब भी पत्रिका मुझे भेजते उसमें लिखा होता रचनांए भेजे साथ में यह भी लिखा होता इस वर्ष का चंदा भी भेजे। अच्‍छा लगता है यह जानकर की व्‍यक्ति स्‍पष्‍ट वादी है संकोच में अपने उपर कोई भार नही लेता, आज के महगांई जैसे युग में पत्रिका का संचालन करना सचमुच एक कठिन कार्य है वह भी बिना किसी विज्ञापन के। वैसे भी अम्‍बेडकर वादी पत्रिका को विज्ञापन देगा भी कौन?आज देश में सैंकड़ो दलित पत्रिकाएँ खुद के दम पर निकल रही है। यदि कुछेक पत्रिकाओं को छोड दे तो । मै भी याद से हर जनवरी उन्‍हे एम ओ से सदस्‍यता राशि भेज देता था। क्‍योकि पत्रिका देर सवेर मिल  ही जाती थी। और पत्रिका से साहित्‍यीक दुनिया खास कर दलित साहित्‍य की दुनिया में होने वाला हलचल का पता चल जाता था। उस समय मेरे पुराने बिलासपुर के पते पर लगभग 10 से 15 पत्रिकाएँ आती थी। लेकिन पता बदलने के कारण, एवं नया पता जो की रायपुर का है, सभी को भेजने के बाद भी ज्‍यादातर पत्रिकाएँ पुराने पते पर ही पहुँचती और मुझ तक आने में देर हो जाती।
मुझे अपेक्षा का आख़िरी अंक संख्‍या 46-47 जनवरी जून 2014 को मिला सरसरी नजर में देखा अंक अच्‍छा है। यह सोचकर की पत्रिका फूर्रसत में पढूंगा मैने दराज़ में रख लिया। फिर उनका लिखा हुआ संपादकीय पढा जो दिवंगत ओमप्रकाश वाल्‍मीकि पर केन्द्रित था। मन हुआ की तेज सिंह से फोन पर बात करूं की आपने एक अच्‍छा विश्लेषण पेश किया है बिना उनके आभा मंडल में आये। लेकिन कुछ दिन बाद खबर आई की वे नही रहे। दिनांक   15 जुलाई 2014 को उनका देहांत हो गया।
तब से मुझे लगता था की उनके उपर कुछ लिखा जाना चाहिए इसी बीच रजनी अनुरागी का फोन आया और उन्‍होने बताया की मगहर उन पर एक विशेषांक निकाल रही है। आप उन पर लिखे तो अच्‍छा रहेगा। मैने व्‍यस्‍तता के बावजूद उन्‍हे रचना भेजने का आश्‍वासन दे दिया। मै इस बात का जिक्र इस लिये कर रहा हूँ की एक ओर एड भगवान दास के जाने के बाद मौत ने दलित साहित्‍यकारों के घर का मानो रास्‍ता देख लिया हो और प्रो तुलसी राम तक लगातार दलित साहित्‍यकारों के दिवंगत हाने की दुखद ख़बरे आती रही। लगभग सभी साहित्‍यकारों पर विभिन्‍न पत्रिकाओं में विशेषांक देखने को मिला लेकिन तेज सिंह कहीं छूट जा रहे थे। मगहर ने ये कमी पूरी कर दी।
तेज सिंह अपेक्षा के इस संपादकीय में लिखते है कई बार हम लेखक को उसके व्‍यक्तित्‍व से भी जान जाते है  और कई बार उसके रचनात्‍मक लेखन से भी। लेकिन हमें यह भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि लेखक के रचनात्‍मक लेखन में सब कुछ सच नही होता है। उसमें सच के साथ झूठ भी मिला होता है। इसलिए रचनात्‍मक लेखन सच और झूठ का मिला जुला रूप होता है। साहित्यिक भाषा में कहूँ तो वह कल्‍पना और यथार्थ का मिला जुला रूप है। यह अलग बात है कि उसमें सच कितना है और झूठ कितना , यह लेखक की रचनात्‍मक क्षमता पर निर्भर करता है कि वह सामाजिक यथार्थ के सृजन में कल्‍पना का कितना सहारा लेता है। इसलिए मेरी दृष्टि में सृजनात्‍मक लेखन के लिए तीन चीजों का होना लाज़िमी होता है- अनुभूति, कल्‍पना और विचार। इन तीनों सृजनात्‍मक शक्तियों के बिना सृजनात्‍मक लेखन संभव नही है।
ये वाक्‍य तेज सिंह की रचना प्रक्रिया में गहरी पैठ को दर्शाता है, भले ही वे किसी दूसरे संदर्भ में ये बाते कह रहे है हो लेकिन उनके उपर भी यह शत प्रतिशत सही बैठता है। ऐसा माना जाता रहा है  कि ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्‍दी दलित साहित्‍य के डॉन थे, किसे बनाना है किसे बर्बाद करना है वे तय करते थे। इसलिये उनके जीते जी उनसे लोग खौफजदा रहते थे। चंद ही ऐसे लेखक थे जो किसी की परवाह बगैर अपनी बात डंके की चोट पर कहते थे उनमें से एक थे तेज सिंह।
जब अपने आपको पक्‍का अम्‍बेडकरवादी, बौद्धिष्‍ठ  बताने वाले दलित साहित्‍यकार, ओमप्रकाश वाल्‍मीकि को अपनी भक्ति प्रदर्शित कर रहे थे। ऐसे वक्‍त तेज सिंह तथ्‍यों साथ अपने बात रख रहे थे। भले ही ओमप्रकाश वाल्‍मीकि बार बार यही दोहराते रहे कि मेरा मानना है कि किसी प्रकार का जातिवाद डॉं अंबेडकर दर्शन और संघर्ष के विरूध्‍द है। व्‍यक्ति स्‍वयं को अंबेडकरवादी कहता है तो उसे जातीय अहम छोड़ना होगा, जातिवादी सोच एवं मान्‍यताओं के खिलाफ खड़ा होना होगा। लेकिन वाल्‍मीकि ने की भी  अपने आपको अंबेडकरवादी नही माना। अंत तक आते आते अपने आपको दलितवादी मानने लगे थे। पृष्‍ठ 9
वे आगे बयान पत्रिका के हवाले से लिखते है कि ‘’ उसकी मृत्‍यु के बाद यही हुआ भी। उनकी तेरह वी पर आर आर एस और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने मंत्र, शंखनाद और यज्ञ के साथ हवन किया और उस हवन कुंड में अग्नि‍ प्रज्‍ज्‍वलित करके पूर्ण आहुति दी गई। यह सब अपने आप या जबरदस्‍ती नहीं किया गया होगा बल्कि उनके परिवार की इच्‍छा के अनुसार किया गया होगा। एसा कर्मकांड उसी स्थिति में ही संभव हो सकता है जिसकी विचारधारा से लेखक व्‍यक्तिगत संबंध रहा होता है। वाल्‍मीकि भाजपा या आर एस एस से अपने राजनीतिक संबंधों को जीवन भर छुपाते रहे, लेकिन उनकी मृ‍त्‍यु के बाद हुए कर्मकांड ने जाहिर कर दिया। ’’ पृष्‍ठ 13
यह बाते भीतर तक आहत कर देने वाली है, संदेह इस बात पर जाता है क्‍या यही कारण थे की सवर्ण लेखक उन्‍हे हाथो हाथ लिया करते थे। कहीं ये एक षडयंत्र का हिस्‍सा तो नही। जबकि उसी वाल्‍मीकि समाज के प्रसिध्‍द लेखक एड भगवान दास थे उन पर ऐसा लांछन कभी नही लगा।

बहरहाल एक प्रश्‍न हमेशा मूह बांये खडा रहा है की क्‍या लेखक अपनी रचना प्रक्रिया के साथ जीता है या नही। क्‍या उसके सिद्धांत दिखावे के लिए और, अमल के लिए और होते है। या वह कोई और मुखौटा लगा कर रचना करता है और दूसरा मुखौटा लगा कर जीवन जीता है। अम्‍बेडकरी साहित्‍य  आंदोलन या जिसे दलित साहित्‍य भी कह सकते है में  ऐक समय ऐसा भी आया  जब रामदास आठवाले, उदित राज जैसे लोगों ने अपना नक़ाब हटाया और सिद्धांत को लात मारकर पद प्रतिष्‍ठा अपनाया। तब लोगों ने अपने आप को छला हुआ महसूस किया। दो मुखौटे का आरोप प्रगतिशील लेखकों सहित कम्‍युनिष्‍ट लेखकों पर भी लगे। उनका पर्दाफ़ाश भी होता रहा। कम्‍युनिष्‍ट आंदोलन शायद इन्‍ही मौकापरस्‍तों सिद्धांत वादियों के कारण अंतिम सांसे गिन रहा है । ऐसे दो मुखौटे वाले रचना कारों का निरंतर पर्दा फास होना भी चाहिए। लेकिन ऐसे मुखौटों की दुनिया में बहुत ऐसे भी रचना कार है जिनकी  लेखनी और करनी में फर्क नही है। शायद आज ऐसे रचना कारो की बदौलत ही अंबेडकरी आंदोलन जिन्‍दा है और फल फूल रहा है। वरना नाम, दाम और इनाम के लालच में सिंद्धात को किताबों में दफन करने वाले छद्म रचना कार भी कम नही है।  निस्संदेह तेज सिंह एक ऐसे ही सच्‍चे रचना कार थे। जिनकी लेखनी और करनी में अंतर नही था। ऐसे रचना कार तेज सिंह को मेरा क्रांतिकारी सलाम।

सोमवार, 20 जून 2016

शनि शिंगणापुर और हाजी अली में प्रवेश पर महिलाओं के संघर्ष का सच


संजीव खुदशाह
सन 1645 के आस पास शिंगणापुर गांव के पारस नाले में एक शिला बहकर आई और एक दिवा स्वप्न के आधार पर उस शिला को शनि के रूप में पूजा जाने लगा। जो बाद में शनि
शिंगणापुर के नाम से प्रसिध्द हुआ। इसी प्रकार स्वप्न को आधार बताते हुये मूर्ति मिलना उसपर मंदिर निर्माण होना भारत में कोई नई घटना नही हैसत्य कथा एवं टीवी चैनलों में ऐसे समाचार आते रहते है। शनि शिंगणापुर इस लिए चर्चा में नही है कि उसकी शिला किसी पारस नाम के नाले में मिली बल्कि वह इस वजह से चर्चा में है क्योंकि उसकी पूजा करने की चेष्टा एक महिला ने की है। चर्चित होने का कारण भी  किसी आश्चर्य से कम नही, उस पर भी चर्चा का मुद्दा ये की बराबरी के लिए महिलाएं शनि मंदिर में प्रवेश का प्रयास करना चाहती है। जो अधिकार उसे संविधान ने दिया है। कोई ये नही बता रहा है कि देश में उससे भी प्राचीन शनि मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पूजा पर कोई रोक टोक नही है।
ठीक यही कहानी हाजी अली दरगाह की भी है पूरा देश जानता है कि ज्‍यादातर दरगाह में महिलाओं का प्रवेश एक आम बात है। मगर इसके पहले यह जानना दिलचस्प है कि दरगाह के संचालकों ने इस बात की साफ अनदेखी की है कि अजमेर शरीफ का बहुचर्चित दरगाह- जहां पर हिंदू और मुसलमानदोनों लाखों की तादाद में हर साल पहुंचते हैं- वहां पर ऐसी कोई पाबंदी कभी नहीं रही है और न ही मुंबई के माहिम में स्थित मखदूम शाह की दरगाह पर ऐसा कोई प्रतिबंध है। यहां बनी मजार तक महिलाएं बिना रोक-टोक पहुंचती हैं। लेकिन हाजी अली दरगाह में महिलाओं को प्रवेश पर पाबंदी है। कुछ मुस्लिम महिलाये प्रवेश हेतु आंदोलन कर रही है। यहां भी मुद्दा वही बराबरी का है। मजेदार बात ये है की दोनो संघर्ष एक ही समय में चालू किये गये। दोनो संघर्षो में कुछ समानताएं भी है।
शनि शिंगणापुर की घटना को कतिपय प्रगतिशील हिन्दु  इसे महिलाओं का ऐतिहासिक आंदोलन बता रहे है वे कहते है कि महिला अपने हक के लिए लड़ रही है। वे उनकी पीठ थप-थपाने का कोई भी मौका हांथ से गवांना नही चाहते।
दरअसल शनि शिंगणापुर में इस आंदोलन से पूर्व एक रोचक घटना घटी एक महिला ने 28 नवंबर 2015 को शनि चबुतरे में चढ़कर शनि की पूजा अर्चना की थी। CCTV फुटेज से ये मामला सामने आया और विवाद बढ़ने लगा। मंदिर ट्रस्ट ने अपने सेवादारों को निलंबित कर दिया और ये माना की शनि शिला अशुध्द हो गई। दूसरे दिन कई टन दूध से उस मंदिर को धोकर पुन: अभिषेक किया गया। यह भारत की हिन्दू महिला के लिए सबसे शर्म का दिन था। यहां बताना अत्यंत जरूरी है कि 28 नवंबर को महात्मा फुले की पुन्यतिथी भी है। प्रश्न उठना लज़मी है की क्या वह महिला महात्मा फूले के विचार से प्रेरित थी। या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक है। दरअसल जो लोग महात्मा  ज्योतिबा के विचार से परिचित है वे जानते है कि त्योतिबा ने समानता के हक के लिए कभी भी मंदिर जाने की बात नही कही, वे समानता के लिए स्कूल जाने की बात कहते थे। शनि शिगणापुर मंदिर प्रवेश को लेकर आंदोलन कर रही भूमाता ब्रिगेड की मुखिया श्रीमती तृप्ति देसाई के बारे में बतादू की वे अन्ना की शिष्या है वे अन्ना के विभिन्न आंदोलनो में उनके साथ देखी गई। वैसे उनका खास बौध्दिक बेकग्राउण्डक क्या है बतना कठिन है। लेकिन ऐसे वक्त  जब छत्तीसगढ़ में सी आर पी एफ के जवानो द्वारा  आदीवासी महिलाओं के स्तन निचोड़कर यह देखा जा रहा है की वे शादी शुदा है या नहीजब हर घंटे एक दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा होद्रोणाचार्य रूपी व्यवस्था द्वारा छात्र रोहित का गला घोटा जा रहा हो ऐसे समय इन मुद्दो पर मौन रहते हुये कुछेक महिलाओं का मंदिर मजार प्रवेश हास्या‍स्पद लगता है। उस पर भी इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा इन्हे  हाथो हाथ लेना प्रायोजि‍त जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है की मंदिर प्रवेश का आंदोलन दरअसल मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश मात्र है। ताकि रोहित वेमुलाआदिवासी महिलाओंदलितों अल्पसंख्यको के मुद्दो से ध्यान भटकाया जा सके। क्योकि मंदिर आंदोलन इससे पहले भी हो चुके है, खुद डॉं अंबेडकर ने दलितों शूद्रों के लिए मंदिर प्रवेश आंदोलन किया था लेकिन मकसद पूजा नही समानता का था। दरअसल डॉं अम्बेडर, महात्‍मा फूले जैसे तमाम समतावादी विचारक यही मानते थे । की जो धर्म तुम्हे नीच और पतीत कहे वो तुम्हारा हो ही नही सकता। तुम उसका बहिष्कार करो। यदि भू माता ब्रिगेड की महिलाये ये किसी वैचारीक आंदोलन से प्रेरित होती तो इस व्यवस्था का बहिष्कार करती। लेकिन वे मंदिर प्रवेश एवं पूजा का अधिकार चाहती है। जिसे प्रवेश उन्हे प्रायेाजित कार्यक्रम के अनुसार देर सवेर दिया जाना ही है। वैसे भी बढती वैज्ञानिकता और समतावादी विचारधारा ने महिला वर्ग को जागृत किया है ऐसे वक्‍त अपनी तुछ परंपराओं को जीवित रखने के लिए प्रवेश देना उनकी मजबूरी है।
बेहतर होता महिलाएं अपने मानव होने के अधिकार को मांगती उनके स्पर्श से अशुध्द होने वालो का बहिस्कार करतीवे उन ग्रंथो को प्रति‍बंध लगाने की मांग करती जो उन्हे‍ नरक का द्वार कहती, पशु का दर्जा देती। वे ऐसी किताबो को मानने से इनकार करती जो उसे इद्दत की मुद्दत तथा हलाला  के लिए मजबूर करती। 

राष्ट्रीय समाचार पत्र देशबंंधु में प्रकाशित