बुधवार, 27 अगस्त 2014

जन समाज की भाषा से संस्कृत भाषा का जन्म हुआ।

पुस्तक समीक्षा

संस्कृत सबसे नई और कृत्रिम भाष्‍ाा है।

संजीव खुदशाह

भाषा की उत्पत्ति के विषय में अधिकांश प्राचीन जनों का यह विश्वास था कि यह ईश्वर कृत है। बाइबिल के अनुसार भाषा की उत्पत्ति आदम के साथ हुई। वह देवताओं की भाषा को समझते थे।
कुरान की एक आयत के अनुसार भी उसने आदम को नाम सिखाए, सारे के सारे नाम।मिश्री अपनी भाषा को देवताओं की सृष्टि मानते थे। सत्रह वी शताब्दी तक स्वीडन के एक भाषा शास्त्री का यह निश्चित मत था कि ईडन के बाग में ईश्वर, आदम और सांप क्रमश: स्विस, डेनिस और फ़्रेंच भाषा में बात करते थे। इसी प्रकार भारत में कुछ लोग संस्कृत को देव भाषा मानते है और वेद आदी संस्कृत ग्रंथ अपौरूषेय बताते है।
प्रस्तुत किताब आर्य द्रविड भाषाओं का अंत: संबंधमें इन सब मुद्दों पर विस्तार से ‍विमर्श किया गया है। इस किताब में लगभग 15 अध्याय है। अध्यायों का शीर्षक रोचक है। जैसे प्राच्य विद्या की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, भाषा की उत्पत्ति और विकास, संस्कृत धातुओं की पृष्ठभूमि, संस्कृत और द्रविड भाषाएं, आर्य द्रविड शब्द भंडार की जङे आदी।
इस किताब के आमुख में लेखक प्रकाशक के बारे में एक अजीब टिप्पणी करते है। जैसे की किसी मजबूरी में उन्हे यह किताब इस प्रकाशक से प्रकाशित करने हेतु बाध्य होना पङा।
मेरे अपने जीवन और मेरी कतिपय पुस्तको के साथ ऐसा ही रहा है। उसी का परिणाम है कि जहां इस पुस्तक का प्रकाशन एक अन्य प्रतिष्ठान से होना था, वहां इसे सस्ता साहित्य मंडल से प्रका‍शित कराने का निर्णय लेना पङा।
ग़ौरतलब है कि इस किताब का पहले 1973 में प्रकाशन हो चुका, यह इसका पुन: प्रकाशन है।
बहरहालप्राच्य विद्या की मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमिअध्याय शीर्षक में वे लिखते है प्राच्य भाषा विद्वानों ने संस्कृत सहित अन्य भाषाओं का जो अध्ययन, ग्रंथो के अनुवाद लिखे। उसका एक मात्र उद्देश्य था। हिन्दू धर्म का नाश करना ईसाई धर्म का प्रचार करना। लेखक का मानना है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी और अन्य अँग्रेज़ अफ़सर इसी लक्ष्य से वेदो स्मृतियों का अनुवाद प्रकाशन में अहम भूमिका निभाते थे। वे मेक्समुलर जैसे विद्वान पर प्रश्न उठाते हुए लिखते है।
संस्कृत के अध्येता मैक्समूलर का जो गौरव पूर्ण स्थान है उसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नही। प्राच्यविद्या के क्षेत्र में शायद ही किसी अन्य विद्वान ने इतना बङा काम किया हो जितना इस जर्मन विद्वान ने। पर अपनी सीमाओं से वह भी उपर नही उठ सका था और उसकी यह सीमा भारतीय सामग्री को समझने के मार्ग में उसकी सबसे बडी बाधा थीदेखे पृष्ठ 50
वे आगे एक पत्र के हवाले से कहते है, 16 दिसंबर, 1868 को भारत सचिव ड्यूक आँफ आर्गाइल को पत्र में उन्होने लिखा था, “भारत का पुरातन धर्म रसातल को जाने वाला है और यदि ईसाइयत इसका स्थान लेने को अग्रसर नही होती तो इसमें किसकी गलती है।देखे पृष्ठ 51
यदि ऐसा सही भी था इसके बावजूद इन विदेशी विद्वानों के श्रम को कम करके नही आंका जा सकता क्योकि कई शासक आये लेकिन इस प्रकार की खोज किसी ने नही की। जबकि यह सर्वज्ञ है कि किस प्रकार भारत के संस्कृत साहित्य को छिपा कर रखा गया। उसे पढना तो दूर देखने तक का हक नही था। उसे देव भाषा ईश्वर कृत ग्रंथ कहा गया जो गैरब्राम्हणों के सिर्फ देखने या सुनने से ही अपवित्र हो जाता था।
मैक्यमूलर सहित अन्य पाश्चात्य विद्वानों ने न सिर्फ इन किताबों को पढा बल्कि इसका अनुवाद अंग्रेजी में किया तथा दुनिया को ये बतला दिया की इसमें रहस्य जैसा कुछ नही है। आज ये किताबें अंग्रेज़ी से अनूदित होकर हिन्दी में उपलब्ध है। हमें तो इन पाश्चात्य विद्वानों का ऋणी होना चाहिए जिन्होंने कई अपठ्य प्राचीन भाषाओं को पढा और उसका मतलब बताया। जिन शिलालेखों पर ग्वाले बैठा करते थे या जो सिर्फ पूजा करने के काम आती थी। उन्होने इनके ऐतिहासिक महत्व को बताया।
सकारात्मक तथ्य यह है कि भगवान सिंह संस्कृत सहित अन्य भाषाओं को देवताओं से उत्पन्न भाषा नही मानते। किंतु आर्य और द्रविड़ भाषाओं को एक ही कुल की भाषा मानते है। आर्य और द्रविड भाषाएं परस्पर भिन्न कुलों की भाषाएं नही है अपितु वे एक ही भाषाई पर्यावरण से निकली है निश्चय ही उनका संबंध प्राचीन अवस्थाओं पर जाकर जुडता है न कि ऊपरी स्तर परदेखे अध्याय शीर्षक भाषा की उत्पत्ती और विकासपृष्ठ 103
वे वैदिक एवं संस्कृत दोनो को ही कृत्रिम भाषाएं मानते है । वे प्राकृत के बारे में कहते है प्राकृत नाम से इतना तो स्पष्ट है कि यह नाम संस्कृत के विकास के बाद पडा था और इसका लक्ष्य संस्कृत का जन बोलियों से भेद प्रकट करना था। प्रकृत या प्रकृति शब्द से इस शब्द की व्युत्पत्ति यह प्रकट करती है कि यह सामान्य या अशिक्षित जन समाज की भाषा थी, जबकि संस्कृत विशिष्ट वर्ग की, विशिष्ट प्रयोजन से निर्मित भाषा।देखे पृष्ट 131
इसी तारतम्य में वे डा चाटुर्ज्या के हवाले से लिखते है कि प्राकृत भाषाओं से ही कृत्रिम भाषाएं वैदिक एवं संस्कृत का विकास हुआ। इस अध्याय वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियाँमें वे यह नई स्थापना देते है। जो महत्वपूर्ण है।
1-         संस्कृत अलौकिक या देव भाषा नही है।
2-         संस्कृत और वैदिक भाषाएं कृत्रिम भाषा है। इनका कभी भी आम बोलचाल में प्रयोग नही हुआ।
3-         उक्त दोनो भाषाओं का विकास प्राकृत से हुआ।
4-        प्राकृत जो आम जन समाज की भाषा थी, का नामाकरण संस्कृत के विकास के बाद हुआ।
5-         द्रविड भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है।
उनकी इस स्थापना से यह बात सिद्ध होती है कि संस्कृत आर्यों की भाषा नही है क्योंकि इसका विकास प्राकृत से हुआ है प्राकृत जन मानस की भाषा थी। आर्यों की नही।
द्रविड भाषा के बारे में लेखक भगवान सिंह द्रविड भाषा के विद्वान काल्डवेल के हवाले से लिखते है कि द्रविड भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है। काल्डवेल की अनेक स्थापनाओं में संशोधन हुआ है, परंतु द्रविड भाषा के पृथक परिवार की अवधारणा और तथ्य कि इसकी उत्पत्ति संस्कृत से नही हुई है, अकाट्य मानी जाती है। यह सच है कि द्रविड भाषाओं की जननी संस्कृत नही है, परंतु उतना ही सच यह भी है कि उत्तर भारत की आधुनिक बोलियों की जननी भी संस्कृत नही है।अध्याय शीर्षक संस्कृत और द्रविड भाषाएंदेखे पृष्ठ 155
यह एक बेहतरीन किताब है। शोधात्मक भाषा शैली में लिखी यह किताब आम पाठक के लिए भी रोचक है। लेखक ने प्राकृत संस्कृत से लेकर द्रविड़ भाषा के अंत:संबंध को बडी गहराई और शिद्दत से प्रस्तुत किया है। आशा करता हूँ भाषा विज्ञान से सरोकार करने वालो के लिए यह एक बहुमूल्य किताब सिद्ध होगी।
किताब  का नाम - आर्य द्रविड भाषाओं का अंत: संबंध (2013)
लेखक          - भगवान सिंह
पृष्ठ             -275  ISBN -978-81-7309-674-7(PB)
मूल्य           -160 रू
प्रकाश्‍ाक         - सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन

एन - 77, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली 110001
प्रसिध्द पत्रिका युध्दरत आम आदमी के जुलाई 2014 में प्रकाशित

मंगलवार, 27 मई 2014

गर्म लावे

मै जानता हूं,
अगर मै कुछ कहता
ये मेरी जीभ काट ली जाती।
मै जानता हूं,
अगर मै कुछ सुनता
मेरे कानों में गर्म लावे ठूंस दिये जाते।
जिसे बताते थे तुम अपना, रहस्य खजाने का 
जिस पर तुम आध्यात्म के नाम पर इठलाते थे इतना
मैने आज इनको पढ़ लिया है।
जान लिया है वो कारण,
जीभ को काटने का
कानो में गर्म लावे ठूसने का
मेरे ही पूर्वजों का पौरूष दफ्न है।
तुम्हारी इन पोथियों में, जिन्हे तुमने दानव राक्षस पुकारा था

संजीव खुदशाह

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

पटवारी का इतिहास


  •    संजीव खुदशाह
आज पटवारी भारत के जन मानस का एक महत्वपूर्ण अंग है। कोई भी गांव की कहानी पटवारी के जिक्र के बिना पूरी नही होती। लोक गीत लोक-कथाओं में इसकी मौजूदगी गहरे पैठ को दर्शाती है। पहले पटवारियों के पास दो कोड़ेदार, ग्राम कोतवाल और घोड़े हुआ करते थे।
भारत के ज्ञात इतिहास में सर्वप्रथम भूमि को नाप कर उसका हिसाब किताब रखने का कार्य

बादशाह शेर शाह सूरी ने 1537 मे किया था इसी ने ज़मीन मामले की देखरेख हेतु पटवारी पद की स्थापना की। इस हेतु बादशाह का मुख्य उद्देश्य भूमि पर लगान वसूली एवं बकाया का इसाब रखना था, जिसके लिए भूमि का हिसाब रखना जरूरी था। इसलिए पटवारी, शासन एवं निज़ी भूमि यों के कागज़ात का संधारण करता था साथ ही लगान वसूली करता था। शेर शाह सूरी के बाद मुग़लों ने भी इस भू प्रबंध को जारी रखा। अकबर के नवरत्नो में से एक टोडरमल खत्री ने इसे और सुढ़ड किया। इस समय देश के कौन से खेत में कौन सा फसल बोया गया है और किस भूमि का कितना लगान है इन सबका वर्षवार लेखा जोखा रखा जाता था। जिसे जिन्सवार कहते है। जब भारत में अंग्रेज़ों का शासन था तो उन्हे लाल किले से कई ट्रक कागज़ात मिले उसे डिस्पोज करते समय जांच में पाया गया कि करीब दो से तीन सौ साल तक के जिन्सवार भरे पड़ें थे। वे चकित थे और इन कागजातो को सहेज कर रखा। उल्लेखनीय है कि आज भी राजस्व विभाग द्वारा जिन्सवार उसी तरह बनाया जाता है। जिनके आधार पर फसल का पूर्वानुमान और राष्ट्रीय नीति तैयार होती है। यहां यह भी बताया जाना जरूरी प्रतीत होता है कि राजस्व विभाग में प्रयुक्त शब्दावली हूबहू उसी काल की प्रयोग कि जाती है जैसे- पटवारी, तहसीलदार, नाईब तहसीलदार, कानूनगो, वासील वाकी नवीस, जमादार, हल्का, खसरा, खतौनी, चिटठा, तितम्मा आदी।
पटवारी या उससे मिलती जुलती प्रणाली पूरे विश्व में अपनाई जाती है। किंतु पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल सहित कुछ देशों में पटवारी शब्द आज भी प्रचलित है। वही भारत कुछ हिस्से में पटवारी को अन्य नामो से भी पुकारा जाता है। जैसे गुजरात महाराष्ट्र में कुलकर्णी अब तलाठी, तमिलनाडु में पटवारी अब कर्णम अधिकारी, पंजाब में पटवारी कोपिंड दी मांगांव की मा भी कहा जाता है,आंध्रप्रदेश में अब पटवारी को आर... यानी ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी कहा जाता है, वही राजस्थान में पहले पटवारियों को हाकिम साबहु कहा जाता था। उत्तर प्रदेश में पटवारियों की हड़ताल से खफा होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह ने यह पद ही समाप्त कर दिया। लेकिन बाद में उन्हे लेख पाल के नाम से पुनः बहाल करना पड़ा। उत्तराखण्ड में पटवारी को पुलिस के भी अधिकार प्राप्त है। उन्हे राजस्व पुलिस कहा जाता है। राज्य के 65 फीसदी हिस्से में अपराध नियंत्रण, राजस्व संबंधी कार्यो के साथ ही वन संपदा की हकदारी का काम पटवारी ही सभांल रहे है।
पटवारियों के बारे में कोई केन्द्रीय कृत आंकड़ा नही है। राजस्थान में 10,685 पटवारी है तो मध्यप्रदेश में 11,622 छत्तीसगढ़ में लगभग 3200 वही उत्तर प्रदेश में 27,333 है। छत्तीसगढ़ का भूमि अभिलेख इंटरनेट पर मौजूद है तथा पटवारियों को 10 वर्ष पहले कम्प्यूटर दिये गये थे। लेकिन नई हल्का बंदी होने के कारण पटवारियों की संख्या काफी बढी है, जिन्हे कम्प्युटर प्रदाय किया जाना है।
भूअभिलेख संहिता के अनुसार एक पटवारी को एक निश्चित खाते का एक हल्का दिया जाना चाहिए। ग्रामीण इलाके में नई हल्का बंदी होने के कारण स्थिति ठीक हो गई, लेकिन शहरी इलाके में हल्का बंदी नही होने के कारण स्थिति विकट है। यहां हजारों खाते में एक पटवारी नियुक्त है इस कारण कार्य का बोझ और त्रूटी की संभावनाएं बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ मे ये शहरी इलाके आज भी नई हल्का बंदी का इंतजार कर रहे है।
ये सुखद है 475 वर्ष पुराना पटवारी हमेशा अपने आपको नई तकनीक एवं व्यवस्था के अनुरूप अपडेट किया है। लेकिन भारत की भू प्रबंधन प्रणाली कई मायने में पीछे चल रही है। उसे विकसित देशों के अनुरूप बंदोबस्त को अधतन करना होगा।
Publish on Nov Bharat 23/02/2014

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

कौन करता है बूट पॉलिश राज कपूर जी ?



  • संजीव खुदशाह

फिल्म का नाम बूट पॉलिश
अवधि--153 मिनट
निर्देशकप्रकाश अरोरा
बैनरराज कपूर

यह फिल्म 1954 के आस पास बनी थी। इस ब्लैक एड व्हाइट फिल्म में राज कपूर ने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसे अन्य बैनर उठाने में हिचकिचाते थे। पहले पहल जो भी फ़िल्मे बनी उनमें धार्मिक फ़िल्मो की भरमार थी या किसी पुरानी लोक कहानियों से प्रेरित थी। कारण साफ था ऐसी फ़िल्मो से कमाई होने की गारंटी थी। राज कपूर ने लीग से हटकर फिल्म बनाने की परिपाटी प्रारंभ की आवारा,श्री 420, अनाडी, बूटपालिश ऐसी ही फ़िल्मो की श्रृंखला है।
इस फिल्म में भोला(रतन कुमार) और बेलू(बेबी नाज) दो भाई बहन हैं जिनकी माँ का देहांत हो गया है और पिता को कारावास। उनको उनकी दुष्ट चाची कमला के साथ रहने जाना पड़ता है। कमला उनसे भीख मँगवाती है और उन्हें बुरा-भला कहती है। यह फिल्म रेल्वे स्टेशन के ईर्द-गिर्द घूमती है। स्टेशन के पास ही झोपडीनुमा घर वे रहते है, जहां से ये दोनो भाई बहन भाग कर में रेल गाड़ी में भीख मांगने चले जाते। एक अवैध शराब बनाने वाला अधेड व्यक्ति है, जिसको बच्चे जॉन चाचा (डेविड) के नाम से जानते हैं। जॉन चाचा उनको भीख माँगना छोड़कर एक स्वाभिमान की ज़िंदगी जीने की सलाह देता है।
बच्चे उसकी बात मानकर कुछ पैसे बचा कर बूट पॉलिश का सामान खरीदते हैं। जब कमला को इस बात का पता चलता है तो वह उनका सामान छीन कर उन्हें मारती है और घर से निकाल देती है।
वर्षा होने के कारण अब कोई भी व्यक्ति उनसे बूट पॉलिश भी नहीं कराता है और दोनों को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता है। असहाय बच्चे तब भुखमरी के कगार पर पहुँच जाते हैं जब जॉन चाचा को अवैध शराब बनाने के जुर्म में हिरासत में ले लिया जाता है। एक दिन रेलवे स्टेशन पर अनाथ बच्चों को अनाथालय ले जाने की पकड़ धकड़ चल रही थी। बेलू ट्रेन में चढ़कर बच निकलती है और भोला से बिछड़ जाती है। ट्रेन में बेलू को एक अमीर दंपत्ति गोद ले लेते है। बेलू भोला से बिछड़कर दुःखी हो जाती है।
बूट पॉलिश का काम शुरु करने के बाद भोला ने बेलू को भीख माँगने से मना किया था और यहाँ तक कि बेलू ने कहा न मानने पर उसपर हाथ भी उठाया था, लेकिन अब हालात इतने नाज़ुक हो जाते हैं कि भोला को ख़ुद भीख माँगने की नौबत आ जाती है और एक दिन जब वह रेलवे स्टेशन पर भीख माँग रहा होता है तो उसकी मुलाक़ात बेलू से हो जाती है। फिर दोनों बच्चों को वह अमीर दंपत्ति गोद ले लेते है। फ़िल्म के अंत में दिखाया गया है कि अब दोनों बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
प्रकाश अरोड़ा द्वारा निर्देशित इस श्वेत श्याम फिल्म बूट पॉलिश में बेबी नाज़ , रतन कुमार, चाँद बुर्के और चरित्र अभिनेता डेविड अब्राहम ने अभिनय किया है।  इस फिल्म को सर्वोत्तम फिल्म के लिए फिल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला था केन्स फिल्म समारोह में बाल कलाकार के रूप में बेबी नाज़ के उत्कृष्ट अभिनय का विशेष उल्लेख किया गया । डेविड को सर्वोत्तम सहायक अभिनय के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था।
राज कपूर की अन्य फिल्मो की तरह इस फिल्‍म मे भी निर्माता-निर्देशक की मेहनत साफ झलकती है। निर्देशन और अभिनय पक्ष दमदार है, सूट किया गया लोकेशन जीवंत प्रतीत होता है। सुरीले गीतो से सजी यह फिल्म व्यवसायीक एवं मनोरंजन के दृष्टिकोण से बेहतरीन है। लेकिन फिल्म भारतीय जन मानस की सच्चाई बयां करने में विफल रहती है। यह फिल्‍म शुरू से आखरी तक जाति एवं जातिगत मुद्दों पर बात करने पर परहेज करती है। जबकि भारत का हर व्यक्ति जानता है की  बूट पॉलिश कौन सी जाति के लोग करते है। यहां का कुलीन वर्ग मरते मर जायेगा लेकिन बूट पालिश नही करेगा। राज कपूर शायद इस तथ्य को जानते हुए भी अनजान बनने की कोशिश करते है। जैसा की फिल्म का नाम बूट पॉलिश से झलकता है कि इसमें बूट पालिश करने वाले वर्ग के सुख दुख का लेखा जोखा मिलेगा। किन्तु इस फिल्म में ठीक इसके उल्टा होता है।
अंत में यह दोनो बूट पालिश करने वाले बच्चों को एक रईस निःसंतान दंपत्ति गोद ले लेते है। यहां भी जाति का मुद्दा ग़ायब रहता है। जबकि 1954 में फिल्म निर्माण के वक्त जाति प्रथा, छुआ-छूत चरम पर थी। बेहतर होता इस फिचर फिल्म में उन लाखों लोगो के दुख दर्द को सिल्वर स्क्रीन में उतारा जाता, जिन्होंने पीढी दर पीढी इस कार्य को किया और भोगा है।